Sunday, January 24, 2010

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया

गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

अज़ाब – punishment / Pain
सराब- Illusion
आफताब- Sun

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Sunday, January 17, 2010

हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते

हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते
दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते

नज़दीक बहुत गर रहे, बन जाओगे आदत
ये सोच के, मिलने तुम्हें अक्सर नहीं आते

जिस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजरा
उस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते

मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल हो
अब ज़हन में अल्फ़ाज़ के पैकर नहीं आते

बिस्तर पे कभी करवटें बदलें वो भी 'श्रद्धा'
आँखों में ये नायाब से मंजर नहीं आते.

पैकर – आकृति

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Sunday, January 3, 2010

कोई पत्थर तो नहीं हूँ , कि ख़ुदा हो जाऊँ

कैसे मुमकिन है, ख़मोशी से फ़ना हो जाऊँ
कोई पत्थर तो नहीं हूँ, कि ख़ुदा हो जाऊँ

फ़ैसले सारे उसी के हैं, मिरे बाबत भी
मैं तो औरत हूँ कि राज़ी-ओ-रज़ा हो जाऊँ

धूप में साया, सफ़र में हूँ कबा फूलों की
मैं अमावस में सितारों की जिया हो जाऊँ

मैं मुहब्बत हूँ, मुहब्बत तो नहीं मिटती है
एक ख़ुश्बू हूँ , जो बिखरूँ तो सबा हो जाऊँ

गर इजाज़त दे ज़माना, तो मैं जी लूँ इक ख़्वाब
बेड़ियाँ तोड़ के आवारा हवा हो जाऊँ

रात भर पहलूनशीं हों वो कभी “श्रद्धा” के
रात कट जाए तो, क्या जानिये क्या हो जाऊँ

फ़ना = तबाह
कबा = लिबास
जिया = चमक, रोशनी
सबा = ठंडी हवा

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Friday, November 13, 2009

कितना आसान लगता था

Nazm,

कितना आसान लगता था
ख़्वाब में नए रंग भरना
आसमाँ मुट्ठी में करना
ख़ुश्बू से आँगन सजाना
बरसात में छत पर नहाना

कितना आसान लगता था

दौड़ कर तितली पकड़ना
हर बात पर ज़िद में झगड़ना
झील में नए गुल खिलाना
कश्तियों में, पार जाना

कितना आसान लगता था

जिंदगी में पर हक़ीक़त
ख्याल सी बिलकुल नहीं है
जिंदगी समझौता है इक
कोई जिद चलती नहीं है

जिंदगी में पर हक़ीक़त
सोच सी बिलकुल नहीं है

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Sunday, October 25, 2009

हँस के जीवन काटने का मशवरा देते रहे

हँस के जीवन काटने का, मशवरा देते रहे
आँख में आँसू लिए हम, हौसला देते रहे.

धूप खिलते ही परिंदे, जाएँगे उड़, था पता
बारिशों में पेड़ फिर भी, आसरा देते रहे

जो भी होता है, वो अच्छे के लिए होता यहाँ
इस बहाने ही तो हम, ख़ुद को दग़ा देते रहे

साथ उसके रंग, ख़ुश्बू, सुर्ख़ मुस्कानें गईं
हर खुशी को हम मगर, उसका पता देते रहे

चल न पाएगा वो तन्हा, ज़िंदगी की धूप में
उस को मुझसा, कोई मिल जाए, दुआ देते रहे

मेरे चुप होते ही, किस्सा छेड़ देते थे नया
इस तरह वो गुफ़्तगू को, सिलसिला देते रहे

पाँव में जंज़ीर थी, रस्मों-रिवाज़ों की मगर
ख़्वाब ‘श्रद्धा’ उम्र-भर, फिर भी सदा देते रहे


2122, 2122, 2122, 212

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Sunday, October 11, 2009

फिर किसी से दिल लगाया जाएगा

अब नया दीपक जलाया जाएगा
फिर किसी से दिल लगाया जाएगा

चाँद गर साथी न मेरा बन सके
साथ सूरज का निभाया जाएगा

रस्म-ए-रुखसत को निभाने के लिए
फूल आँखों का चढ़ाया जाएगा

कर भला कितना भी दुनिया में मगर
मरने पे ही बुत बनाया जाएगा

आईना सूरत बदलने जब लगे
ख़ुद को फिर कैसे बचाया जाएगा

मेरी अलबम कुछ करीने से लगे
उनको पहलू में बिठाया जाएगा

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Thursday, September 10, 2009

हमदर्द मगर कोई बनाया करो ‘श्रद्धा’

सबको गले से तुम न लगाया करो ‘श्रद्धा’
हमदर्द मगर कोई बनाया करो ‘श्रद्धा’

बैठा करो कुछ देर चराग़ों को बुझा कर
आँखें कभी खुद से, न चुराया करो ‘श्रद्धा’

जाया करो मेले कभी, बागों में भी टहलो
हंस-हंस के भरम ग़म का मिटाया करो ‘श्रद्धा’

बंदूक-तमंचे से जो घिर जाए ये बचपन
पर्वत, नदी, फूलों से मिलाया करो ‘श्रद्धा’

बादल हो घने गम के चमकती हो बिजलियाँ
बरसात में मल-मल के नहाया करो ‘श्रद्धा’

ये क्या कि हो जाना तेरा महफ़िल में भी तन्हा
आते हो तो इस तरह न आया करो ‘श्रद्धा’

नुकसान-नफा सोच के रिश्ते नहीं बनते
कुछ त्याग-समर्पण भी तो लाया करो ‘श्रद्धा’

Beh'r - 221 -1221-1221-122

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