Saturday, February 12, 2011

मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी

जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी
तरावत= ताज़गी

भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन
सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी

नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

59 comments:

शारदा अरोरा February 12, 2011 at 3:20 PM  

Bahut achchhee gazal , khaskar ye sher bahut pasand aaya ...
धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

संजय भास्कर February 12, 2011 at 3:26 PM  

आदरणीय श्रद्धा जी
नमस्कार !
..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

वाह !! बहुत खुबसूरत शेर ...
मज़ा आ गया , शानदार गज़ल ||

संजय भास्कर February 12, 2011 at 3:27 PM  

वाह !! बहुत खुबसूरत शानदार गज़ल ||

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ February 12, 2011 at 3:41 PM  

वाह वाह वाह, एक और शानदार ग़ज़ल, मगर ये शे’र भरती का है।

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

V!Vs February 12, 2011 at 4:30 PM  

Aapki lagbhag har gazal meine padi h. Ap hmaesha hi umda likhti h.
Isme bhukhmari aur kokh bala part kuch jyada pasand aya.

nilesh mathur February 12, 2011 at 4:33 PM  

वाह! क्या बात है! बेहतरीन ग़ज़ल!

सुनील गज्जाणी February 12, 2011 at 4:44 PM  

आदरणीय श्रद्धा जी
नमस्कार !
दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

वाह !! बहुत खुबसूरत
मज़ा आ गया ,
शानदार गज़ल ||

सुमन'मीत' February 12, 2011 at 6:15 PM  

bahut hi sundar gazal...

राज भाटिय़ा February 12, 2011 at 6:56 PM  

बहुत खुबसूरत रचना, धन्यवाद

राजेश उत्‍साही February 12, 2011 at 8:09 PM  

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी
*
बहुत बड़ी बात कह दी आपने इसमें। यही हकीकत है।

नीरज गोस्वामी February 12, 2011 at 8:11 PM  

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने...इस काफिये पर ग़ज़ल कहना हुनरमंदी का काम है और ने क्या खूब कर दिखाया है...हर शेर लाजवाब है...दाद कबूल करें...
नीरज

Manav Mehta February 12, 2011 at 9:44 PM  

bahut khubsurat

सुरेन्द्र "मुल्हिद" February 13, 2011 at 12:46 AM  

khoobsurati ki paraakaashtha ko chhoti aapki gazal bahut achhi lagi.

Patali-The-Village February 13, 2011 at 10:58 AM  

बहुत बड़ी बात कह दी आपने इसमें। यही हकीकत है।
धन्यवाद|

डॉ. मनोज मिश्र February 13, 2011 at 12:44 PM  

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी
बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी...
बहुत उम्दा रचना-उम्दा सन्देश,बधाई.

रचना दीक्षित February 13, 2011 at 1:49 PM  

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

बहुत लाजवाब ग़ज़ल है हर शेर दाद के काबिल.ऐसा लगता है की दिल दिमाग सब कुछ उड़ेल दिया है दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

' मिसिर' February 14, 2011 at 12:10 AM  

एक ताज़गी भरी ग़ज़ल आपकी लेखनी से ,
बहुत अच्छी लगी !

अरूण साथी February 14, 2011 at 12:25 AM  

क्या कहें शब्द हीं नहीं मिल रहे। क्या गजल है, एक एक शेर जैसे दिल में उतर जांय। बेटियों को मारने वाली बात सच में सच ही है कि कयामत होगींे.

RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य February 14, 2011 at 1:10 AM  

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

kamal ki baat kahi aapne.


gazal bahut pasand aayi.

वीनस केशरी February 14, 2011 at 4:20 AM  

zindabad

Mukesh Kumar Sinha February 14, 2011 at 1:56 PM  

जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी

aapki gajal me sach me ek tajgi hoti hai...shraddha jee...:)
bahut dino se aapka koi post nahi dikha...lekin fir se wahi tajgi..:)

सदा February 14, 2011 at 5:45 PM  

वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ।

ehsas February 14, 2011 at 9:32 PM  

उपर वाले से यही दुआ है कि आपकी गजलों की तरावत हमेशा बनी रहे।

ललितमोहन त्रिवेदी February 14, 2011 at 11:19 PM  

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी
श्रृद्धा जी , बहुत अच्छा लिख रहीं हैं आप ! अशआर में संजीदगी , कहन और बुनावट का सामंजस्य इतना बेहतरीन है कि हर शेर लाज़वाब बन पड़ा है ! बहुत खूब ! समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी आइयेगा !
सादर !

$hy@m-શૂન્યમનસ્ક February 15, 2011 at 1:58 AM  

बहोत खुब श्र्ध्धाजी वाकेयी सुंदर रचना....


बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी....

.....वाह बहोत ही उमदा....

Deepak Saini February 17, 2011 at 2:37 PM  

खुबसूरत शानदार गज़ल

सुमन'मीत' February 17, 2011 at 11:29 PM  

bahut sundar.....

rakesh February 20, 2011 at 11:02 PM  

आपका ब्लॉग भी बहुत खूबसूरत है और आपकी गज़ल में व्यक्त भावनाएं भी.

Hindi Sahitya February 20, 2011 at 11:05 PM  

आपने बहुत खूब कहा है-
आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी.

दिगम्बर नासवा February 21, 2011 at 4:10 PM  

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी ...

Bahut khoob ... kamaal ke sher kahe hain aapne ... Shandaar gazal ...

गौतम राजरिशी February 23, 2011 at 1:56 PM  

"आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी"

...अहा! लाजवाब शेर!!

जयकृष्ण राय तुषार February 25, 2011 at 9:06 AM  

आदरणीया श्रद्धा जैन जी सादर प्रणाम |अद्भुत और खूबसूरत अहसास से भरी एक तरोताजा ग़ज़ल पढ़ने को मिली |आपको बहुत बहुत बधाई |

निर्मला कपिला February 25, 2011 at 3:06 PM  

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी
आपकी गज़लों पर कुछ कहने के लिये मेरे पास शब्द नही होते। लाजवाब गज़ल। बधाई।

Dr Varsha Singh March 1, 2011 at 12:47 AM  

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

बेहद शानदार अशआर.....
बहुत खूब कहा है आपने ...।

परावाणी : Aravind Pandey: March 1, 2011 at 10:05 PM  

साथ ढलना वक़्त के तो जिंदगी होती नहीं.
वक़्त को जो साथ अपने ढाल ले, वो ज़िंदगी.::))
first visit to your blog..

अमित March 1, 2011 at 11:18 PM  

अच्छी ग़ज़ल है श्रद्धा जी ये शेर भी अच्छा लगा
धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी
यहाँ दूसरे मिसरे में ’भी’ की जगह ’तो’ रखें तो अधिक सार्थक होग क्योंकि पहले मिसरे में मगर का प्रयोग किया गया है।
सादर

Akhil March 2, 2011 at 7:29 PM  

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

shraddha ji, ek arse ke baad aap ko padh paya hu...bahut khoobsurat aur kamyab gazal..aur ye sher to bas ye maniye aapne kahne me zaldi kar di ya shayad maine der lagaa di...bahut bahut sundar

sagebob March 4, 2011 at 5:15 PM  

बहुत उम्दा ग़ज़ल.

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

बहुत खूब.
आपकी कलम को सलाम.

निर्झर'नीर March 5, 2011 at 5:23 PM  

हर शेर अपने आप में बेजोड़ है लेकिन ये दो शेर ऐसे लगे जैसे खूबसूरत चेहरे के दो झील से आँखें

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी

KESHVENDRA March 7, 2011 at 9:48 PM  

“बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी”

श्रद्धा जी, आपकी गज़लों को पढ़ कर आनंद आया...गहरे सामाजिक और जीवन के सरोकारों से जुडी ग़ज़लें हैं आपकी. पहले भी पवन जी से आपके लेखन की चर्चा सुनी थी, पढकर वाकई बहुत अच्छा लगा. आपके लेखन के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ.

Udan Tashtari March 10, 2011 at 11:56 PM  

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

-वाह!! एक से एक चुनिंदा शेर निकाले हैं, बधाई.

rajeev matwala March 11, 2011 at 5:27 PM  

बेटियों के ही तो दम से है.........
.........In panktiyon me maarmik chitran ka sundar smavesh kiya hai. bhaaw pachh kafi prachurta me bhra hai....hridya prasn huaa aapki achhi gjal padkar....shubhkamnaoo shit.....

neel pardeep March 19, 2011 at 2:21 PM  

कमाल है श्रधा जी
लिखती रहिएगा
हम पढते रहेंगे
सादर
प्रदीप नील www.neelsahib.blogspot.com

VIJUY RONJAN March 22, 2011 at 2:06 PM  

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

a very powerful writing from you..
please continue writing.

संत शर्मा March 29, 2011 at 9:48 PM  

उम्दा ग़ज़ल श्रद्धा जी |
हर शेर लाजबाब, मन प्रसन्न हो गया |

Vivek Jain March 30, 2011 at 3:54 AM  

वाह वाह वाह, सुन्दर भाव, बहुत सुन्दर,

Vivek Jain vivj2000.blogspot.com

sharda monga (aroma) April 9, 2011 at 12:06 PM  

bahut khoob. achchha kaha hai.

sharda monga (aroma) April 9, 2011 at 12:06 PM  

bahut khoob. achchha kaha hai.

sharda monga (aroma) April 9, 2011 at 12:06 PM  
This comment has been removed by the author.
आशु April 10, 2011 at 10:35 AM  

श्रद्धा जी,

बहुत भावुक रचना ....बहुत बहुत बधाई हो!

आशु

singhsdm April 26, 2011 at 8:01 PM  

श्रद्धा जी
बहुत नाशुक्रा हूँ......मुआफी चाहता हूँ, सिंगापुर मुलाकात के बाद न तो आपके ब्लॉग पर आ सका और न ही फोन कर सका. जल्दी ही गलती सुधारूँगा. प्रशांत जी से हमारा नमस्कार बोलियेगा... दरअसल आपका मोबायल न. ही गम हो गया. बहरहाल ये ग़ज़ल बहुत प्यारी है......मतला ता मक्ता हर शेर लाजवाब...... किस किस पर दाद दूं..... !!!!!

जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी
भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन
सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी

नए तेवर हैं इस बार आपके.........!!!!!

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी
नाज़ुक शेर........!!!

Rajey Sha राजे_शा May 16, 2011 at 9:41 PM  

वक्‍त का इंतजार क्‍यों करना, जैसे ही आग लगे आदमी को बदल जाना चाहि‍ये....जि‍सने जलाई है उसे ही बुझाना चाहि‍ये।

mahendra srivastava May 18, 2011 at 7:50 PM  

सच..बहुत ही सुंदर रचना है

कविता रावत May 26, 2011 at 5:43 PM  

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी
...bahut hi sundar gajal...

Sachin Malhotra June 3, 2011 at 2:59 PM  

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान

Richa P Madhwani June 5, 2011 at 1:25 PM  

http;//shayaridays.blogspot.com

manu June 13, 2011 at 2:20 PM  

नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी

बहुत जरूरी शे'र ..

मतला खूबसूरत बना है..
मगर अपने मिजाज़ से हटकर ..

:)

Mayank November 21, 2011 at 6:06 PM  

जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी
बकौल जिगर –दिल गया रौनके हयात गयी –ग़म गया सारी कायनात गयी
और इसलिये ये शेर नया है कि --- परम्परागत शेर होता -- जब कभी मेरी गम-ए-यार से निस्बत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी
तुमने नया और अच्छा शेर कहा !!

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी
A dominating authority is a question for potential growth of others –correct !!

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी—bahut achchhaa sher

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी haasile gazal sher hai

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी
उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता // हज़ारों जुगनुओं से भी अन्धेरा कम नहीं होता –बशीर बद्र –सवाल ये है कि क्या जुगनू उजाला दे सकते हैं ??!! काली रातों में उजालों की हिमायत होगी !!! himaayat –protection safeguarding ,

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी—अच्छा शेर !!
Kaamayaab gazal kahi hai !!!

Utkarsh May 8, 2012 at 1:05 AM  

Bahut achi ghazal kahi aapne.
Mere ghazalon ke blog
www.utkarsh-meyar.blogspot.com par aapka swagat hai.

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