Sunday, January 16, 2011

टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी

शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी
टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी

फिर कोई कबीले से कहीं दूर चला है
बग़िया में किसी फूल पे आई है जवानी

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस
हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी

छप्पर हो, महल हो, लगे इक जैसे ही दोनों
घर के जो समझ आ गए ‘श्रद्धा’ को मआनी

51 comments:

shahroz January 16, 2011 10:59 PM  

शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी
ula bejod !
टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी

फिर कोई कबीले से कहीं दूर चला है
बग़िया में किसी फूल पे आई है जवानी

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी
koi sani nahin! haq hai haq!

तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस
हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी
kya kahna !

छप्पर हो, महल हो, लगे इक जैसे ही दोनों
घर के जो समझ आ गए ‘श्रद्धा’ को मआनी
sach hai sach !

gazal murassa hi mukammal hai lekin kuch sher k kahne hi kya khoob !!
shahroz, now in ranchi

डॉ. मनोज मिश्र January 16, 2011 11:17 PM  

पूरी नज्म बेहद खूबसूरत है,बधाई.

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) January 16, 2011 11:22 PM  

बहुत खूब,,,,, हर शेर कमाल का है पर अंत के तीन शेरों की बात ही अलग है|

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ January 16, 2011 11:37 PM  

आप ही की तरह खूबसूरत ग़ज़ल। मतला बेजोड़, दूसरे शे’र में "बगिया" की जगह "जंगल" हो तो कैसा रहे। इतनी अच्छी ग़ज़ल में "पानी" काफ़िए का दो बार प्रयोग कुछ जमा नहीं। इतना छोटा तो नहीं है आपका शब्दकोश। "आँचल भी" से ऐसा लगता है जैसे सर पे और भी कुछ था जो अब नहीं है। ऐसा कर सकती हैं सर पे नहीं आँचल न ही आँखों में है पानी। मकता बेजोड़। बधाई

ehsas January 16, 2011 11:39 PM  

शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी
टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी
वाह। बेहद खुबसुरत एहसास लिए सुंदर रचना। आभार।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' January 17, 2011 12:19 AM  

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी
वाह...क्या खूब शेर है.
औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी
हासिले-ग़ज़ल शेर है श्रद्धा जी.

Mithilesh dubey January 17, 2011 12:27 AM  

बहुत ही उम्दा गजल ।

अरूण साथी January 17, 2011 12:33 AM  

तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस
हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी

आप की अपनी पहचान यही गजल....साधू....

संगीता स्वरुप ( गीत ) January 17, 2011 1:02 AM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस
हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी
..

बहुत खूबसूरत गज़ल ....

संजय भास्कर January 17, 2011 1:37 AM  

आदरणीय श्रद्धा जैन जी
नमस्कार !

बहुत खूबसूरत गज़ल ....

संजय भास्कर January 17, 2011 1:38 AM  

आप ने बहुत कमाल की गज़ले कही हैं

प्रज्ञा पांडेय January 17, 2011 1:40 AM  

shraddha ji aap gazal kahatiin hain aur khoob kahati hain !! shabd bhi hote hain aur arth men gajab ki hai rawaani ..

प्रज्ञा पांडेय January 17, 2011 1:41 AM  

shraddha ji aap gazal kahatiin hain aur khoob kahati hain !! shabd bhi hote hain aur arth men gajab ki hai rawaani ..

राज भाटिय़ा January 17, 2011 1:58 AM  

बहुत सुंदर लगी आप की गजल धन्यवाद

वीनस केशरी January 17, 2011 2:46 AM  

good one :)

नीरज गोस्वामी January 17, 2011 1:42 PM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

इस ग़ज़ल के मतले से मकते(जो लाजवाब है) तक का सफ़र बेहद खूबसूरत है...हर अशआर कमाल का है ...मेरी दिली दाद कबूल करें...

नीरज

' मिसिर' January 17, 2011 1:47 PM  

कल ही आपका ब्लॉग फ़ालो किया ! खूबसूरत है !
आप तो सिद्ध शायरा हैं ! ग़ज़ल बहुत उम्दा है !
बात कहने का खास अंदाज़ है आपका ,सो दिखा!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" January 17, 2011 2:03 PM  

बग़िया में किसी फूल पे आई है जवानी

khoobsoorat bhav se saji gazal Sharddha ji!

sada January 17, 2011 2:49 PM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

बेहद खूबसूरत ....!

संगीता स्वरुप ( गीत ) January 18, 2011 10:50 AM  

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना आज मंगलवार 18 -01 -2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/402.html

डॉ॰ मोनिका शर्मा January 18, 2011 1:52 PM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

हर पंक्ति अर्थपूर्ण ...... बहुत सुंदर

शारदा अरोरा January 18, 2011 3:09 PM  

vaah , bhav abhivykti me saksham

nilesh mathur January 18, 2011 3:10 PM  

बेहतरीन!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " January 18, 2011 6:32 PM  

'औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी '
बहुत सुन्दर !

mahendra verma January 18, 2011 11:21 PM  

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं,
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी।

इस शे‘र में एक कहानी-सी छुपी हुई है।
पूरी ग़ज़ल में पाठकों को प्रभावित करने की क्षमता है।

Harman January 19, 2011 1:26 AM  

bouth he sahi baat likhi hai aapne aacha lagaa..........

Lyrics Mantra
Music Bol

रचना दीक्षित January 19, 2011 4:28 PM  

बेमिसाल ग़ज़ल है. हर एक शेर तराशा हुआ नगीना सा है

दिगम्बर नासवा January 19, 2011 4:48 PM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी..

बहुत ही उम्दा .. खूबसूरत ग़ज़ल ...
ये शेर तो बहुत ही लाजवाब सामयिक लगा आज के हालात पर बेबाक तप्सरा ....

Akhil January 19, 2011 4:50 PM  

shraddha ji,
kafi arse baad aap ko padhne ka mauka mila..meri apni kamiyan hain..aapki gazalon men jo rawani hai wo dil jeet leti hai..bar bar padhne ka man karta hai...har sher kabile daad raha..ye ek mera khas hua...
कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी..
bahut khoob..

anu January 20, 2011 12:21 PM  

शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी
टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी

सुंदर गज़ल ....बहतरीन शेर

अंकित "सफ़र" January 20, 2011 7:31 PM  

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी

बेहद खूबसूरत शेर.

mridula pradhan January 24, 2011 1:51 AM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी
bahot achchi lagi hai.

Rajesh Kumar 'Nachiketa' January 25, 2011 2:47 AM  

Ye bahut sundar hai.....
par kaise ganaa hai isko samajh naheen pataaa....

गौतम राजरिशी January 25, 2011 7:43 PM  

एक बार और पढ़ने आ गया।

इतनी खूबसूरत ग़ज़लों को अब तो किताब के शक्ल में आ जानी चाहिये मैम। उपकार होगा हमसब पर...

Patali-The-Village January 25, 2011 10:52 PM  

पूरी नज्म बेहद खूबसूरत है,बधाई|

Kailash C Sharma January 25, 2011 11:21 PM  

तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस
हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी
...बहुत सुन्दर गज़ल..

ज्ञानचंद मर्मज्ञ January 25, 2011 11:22 PM  

Aad.shraddha ji,
Ghazal ka har sher khubsurat hai.
Aabhaar,
-Gyanchand marmagya

उपेन्द्र ' उपेन ' January 26, 2011 4:08 AM  

श्रधा जी बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति..... हर नज़्म बहुत कुछ कहती हुई...

Dinesh Dadhichi January 28, 2011 1:40 PM  

Your creativity is indeed exceptional. This ghazal again proves that. You always amaze me with your originality of expression. There is the freshness of blooming roses in your ghazals.

प्रेम सरोवर January 29, 2011 10:54 AM  

सीसे के बदन को मिली पत्थर की निशानी......
मन को आंदोलित करती पोस्ट सही संदंर्र्भों में स्वयं ही हर कुछ झकझोर कर चली गयी। मन मोहक पोस्ट।

Abnish Singh Chauhan February 3, 2011 1:23 PM  

"शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी/ टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी"- और यह कहीं किसी उपन्यास से काम नहीं. बहुत खूब. बधाई.

निर्मला कपिला February 3, 2011 2:30 PM  

श्रद्धा जी मै कुछ कहने की हिम्मत नही जुटा पा रही सकते मे हूँ आपकी नायाब गज़ल पढ कर। किसी एक शेर को कोट करना पूरी गज़ल से नाइन्साफी है। बहुत बहुत बधाई आपको।

प्रदीप कांत February 4, 2011 1:24 AM  

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

अच्छे उपयोग हैं

santosh pandey February 5, 2011 2:08 AM  

har sher lajwab. kya baat hai.

: केवल राम : February 5, 2011 7:41 PM  

शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी
टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी

सच्चाई को बखूबी अभिव्यक्त किया है आपने ..पूरी ग़ज़ल का एक -एक लफ्ज अर्थपूर्ण है ...आपका आभार

kishor kumar khorendra February 20, 2011 3:23 PM  

bahut achchhi gajal

निर्झर'नीर March 5, 2011 5:24 PM  

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

exceelent sraddha ji

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह April 15, 2011 1:40 AM  

umda ghazal ke liye hardik abhaar.
sader,
dr.bhoopendra
rewa
mp

Richa P Madhwani June 7, 2011 6:23 PM  

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

खूबसूरत गज़ल

http://shayaridays.blogspot.com

manu June 13, 2011 2:13 PM  

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी..

बेजोड़ शे'र कहा है....हमेशा परेशान किया करेगा...

Mayank November 22, 2011 8:22 PM  

आँचल भी नहीं सर पे न ही आँख में पानी --यहाँ नहीं आँख में पानी --टाइप हुआ है जिसे सहीह करना है !!
कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं,
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी---बहुत जानदार शेर है -कुछ लोगों में मुस्तकबिल की उमंग है और कुछ लोगों को उनका अतीत नहीं छोड़ रहा --बहुत खूब !!
सभी शेर अच्छे हैं !!

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