Tuesday, June 7, 2011

चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

अपने हर दर्द को अशआर में ढाला मैंने
ऐसे रोते हुए लोगों को संभाला मैंने

शाम कुछ देर ही बस सुर्ख़ रही, हालांकि
खून अपना तो बहुत देर उबाला मैंने

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने

लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने

49 comments:

सदा June 7, 2011 at 6:55 PM  

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने
वाह ... बहुत खूब ... ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) June 7, 2011 at 8:24 PM  

बहुत सुन्दर ग़ज़ल!

शहरोज़ June 7, 2011 at 9:48 PM  

tareef karun kya uski......jiske har sher hi bolte hain..

संगीता स्वरुप ( गीत ) June 7, 2011 at 11:27 PM  

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

बहुत सुन्दर गज़ल ..बहुत दिनों बाद पढने को मिली ...

इस्मत ज़ैदी June 8, 2011 at 1:31 AM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने
हक़ीक़त की पथरीली ज़मीन का एह्सास कराता शेर

कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने
बहुत उम्दा ,सच है हमें अपनी ग़लतियां कहां नज़र आती हैं


लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने
वाह !
खूबसूरत ग़ज़ल ,,,मुबारक हो

फणि राज मणि चन्दन June 8, 2011 at 2:51 PM  

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

Bahut khoosoorat ghazal hai
Subhanallah!!!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" June 8, 2011 at 5:29 PM  

शाम कुछ देर ही बस सुर्ख़ रही, हालांकि
खून अपना तो बहुत देर उबाला मैंने

kya shaandaar lines hain ye...aafareen!

निर्झर'नीर June 8, 2011 at 7:26 PM  

आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने

खूबसूरत

निर्मला कपिला June 8, 2011 at 8:53 PM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने
कितना बडा सच कह दिया। किस किस शेर की बात करूँ लाजवाब गज़ल। शुभ.का.

नीरज गोस्वामी June 8, 2011 at 10:26 PM  

इस निहायत खूबसूरत ग़ज़ल, जिसका हर शेर लाजवाब है, के लिए मेरी दिली दाद कबूल फरमाएं...
नीरज

Rajeev Bharol June 9, 2011 at 1:52 PM  

बहुत खूबसूरत...वाह.

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

बहुत ही उम्दा..

singhSDM June 9, 2011 at 3:13 PM  

मैडम..... नमस्कार.
मुद्दत बाद इस वापसी का दिली शुक्रिया.
आनंद जी को भी नमस्कार.
जबरदस्त काफिये का प्रयोग है.....!!!!

पूरी ग़ज़ल बेजोड़ है और उस पर इस शेर के तो क्या कहने ........
अपने हर दर्द को अशआर में ढाला मैंने
ऐसे रोते हुए लोगों को संभाला मैंने
और
कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने
वाह वाह...!!!!

लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने
बहुत ही गैरत वाला शेर कह दिया,.....!!!

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने
क्या खूब कहा.

"अर्श" June 10, 2011 at 12:33 AM  

अहा आते ही धमाका ! कहीं कोई गुंजाइश नहीं की टोक सकूँ... ! बेहद खुबसूरत ग़ज़ल !

KARIM PATHAN Anmol June 10, 2011 at 3:46 PM  

Shradha Ji Namaste,
Bahut Hi Khubsurat Gazal Likhi He.
Share Krne K Liye Shukriya..
ANMOL

ehsas June 11, 2011 at 1:06 AM  

आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने

वाह। क्या बात है।

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो June 11, 2011 at 7:42 PM  

लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने

ek khobsoorat sher...
shubhkaamnaayen.........

अरूण साथी June 12, 2011 at 7:06 AM  

आभार
कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

daanish June 12, 2011 at 1:46 PM  

"बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने"

आज के दौर के इस कडवे सच को
बड़े हौसले के साथ लफ़्ज़ों में पिरो डाला है आपने ...
बड़ा सार्थक शेर है
"लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने"
ज़िन्दगी की इक और तल्ख़ हकीक़त से
रुबरु करवाता हुआ सच्चा शेर...! वाह !!
और
"दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने"
ये अकेला मिसरा ही अपनी बात
मुकम्मल तौर पर कह रहा है ....

ग़ज़ल के तमाम अश`आर
इस बात की जानिब सही इशारा कर रहे हैं
कि ये तहरीर किसी उस्ताद-ए-मुहतरम के क़लम का ही शाहकार है
मुबारकबाद .

Manav Mehta June 12, 2011 at 7:16 PM  

bahut sundar

अनंत आलोक June 12, 2011 at 7:55 PM  

शाम कुछ देर ही बस सुर्ख रही ,हालाँकि
खून अपना बहुत देर उबाला मैंने |.....बहुत ही सुंदर शेर ! क्या बात है श्रद्धा जी जिंदगी कि हकीकत से रूबरू करा दिया आपने ! बधाई|

manu June 13, 2011 at 2:24 PM  

शाम कुछ देर ही बस सुर्ख़ रही, हालांकि
खून अपना तो बहुत देर उबाला मैंने
दर्दनाक शे'र..
बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने
बहुत सही..
कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने
:)


आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने

:)
अक्ल पर से टाला खोल देने के बाद कोई कहाँ सच कह सकता है...
बहुत खूब..

शारदा अरोरा June 13, 2011 at 3:38 PM  

har sher me ek sach hai..khoobsoorat ..

दिगम्बर नासवा June 13, 2011 at 5:06 PM  

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने ...

कमाल की ग़ज़ल है .... बहुत ही लाजवाब शेर लिखे हैं ...

Dr.Bhawna June 14, 2011 at 10:14 AM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने..

eakdam dil ke paas hokar gujar gayi aapki gajal ...

Rachana June 14, 2011 at 9:19 PM  

कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने
ye to sabhi ki aadadt hai
aapki puri gazal bahut sunder hain
rachana

vandana June 17, 2011 at 7:47 AM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

उम्दा शेर

अभिजीत June 23, 2011 at 9:04 AM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

बेहतरीन, पागल हो रहा हूँ मैं, लाजबाब

Vikrant June 23, 2011 at 4:42 PM  

too good. very original. true feeling.

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

somali June 25, 2011 at 7:03 PM  

आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने

आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा'
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने
bahut sundar abhivyakti hai mam

अमिताभ त्रिपाठी ’ अमित’ June 27, 2011 at 7:52 PM  

श्रद्धा जी,
बहुत ही ख़ूब सूरत ग़ज़ल कही है आपने।
मरहबा!
हर शे’र काबिले दाद है
बधाई!
सादर

V!Vs July 6, 2011 at 4:26 PM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने.

bahhut achha likha h........:)

Navin C. Chaturvedi July 20, 2011 at 11:59 AM  

यह ग़ज़ल ख़ुशबू लुटाती है चमेली की तरह|
वाह क्या खूब ये अश'आर निकाले तुमने|
एक एक मिसरे को पढ़ के यूं लगे है मुझको|
यादों के कोष सलीक़े से खँगाले तुमने|

डॉ0 अशोक कुमार शुक्ल July 21, 2011 at 8:08 PM  

aapki yeh gajal http://yogdankarta.blogspot.com
per link ki gayee hai kripaya apne vicharo se awasya awagat karaye.

kp July 23, 2011 at 12:27 AM  

aap ki kavita me sachai he jo ki aaj har ek ki jubani he jo log khus nasib hote he jisko layak santan layak milati he

प्रदीप कांत July 29, 2011 at 1:47 AM  

हर एक शेर अच्छा है

Suresh Kumar August 2, 2011 at 11:03 PM  

लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने
Bahut hi acchi gazal..

swagat hai aapaka mere blog par..

Ojaswi Kaushal August 3, 2011 at 2:48 AM  

Hi I really liked your blog.
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Vijay Kumar Sappatti August 5, 2011 at 4:46 PM  

आपकी गज़ल कि तारीफ़ करना ..मुझे तो नहीं आता श्रद्धा .. आप की लेखनी जो लिखा जाए वो कम है और दिल पर जो असर होता है .. वो तो amazing है ..

आभार

विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

DR. ANWER JAMAL August 13, 2011 at 3:36 PM  

Nice .

देखिये
हुमायूं और रानी कर्मावती का क़िस्सा और राखी का मर्म

अनुपमा पाठक August 15, 2011 at 6:01 AM  

बेहद सुंदर!

Vaneet Nagpal August 29, 2011 at 5:46 PM  

श्रद्धा जी,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगसपाट डाट काम" के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

एक स्वतन्त्र नागरिक August 31, 2011 at 6:41 PM  

सुन्दर ग़ज़ल.
यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

Shayar Ashok September 7, 2011 at 10:52 PM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

वाह !! बहुत खुबसूरत शेर ||
गज़ल पढ़कर , अदभूत आनंद मिला ||

बहुत दिनों बाद आना हुआ ,
इसके लिए क्षमा मांगता हूँ ||

इस गज़ल के लिए दिल से बधाई " आपको "

अशोक

जयकृष्ण राय तुषार September 11, 2011 at 9:53 PM  

खूबसूरत गज़ल बहुत -बहुत बधाई श्रद्धा जी

जयकृष्ण राय तुषार September 11, 2011 at 9:53 PM  

खूबसूरत गज़ल बहुत -बहुत बधाई श्रद्धा जी

Akhil September 13, 2011 at 4:14 PM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने

shraddha ji aapko padhkar hamesha kuch naya likhne ki prerana milti hai...har sher behtreen hua hai..hamesha ke tarah

Mayank November 18, 2011 at 8:25 PM  

अपने हर अश्क को अशआर में ढाला मैने
अपनी गिरती हुई दौलत को सम्हाला मैने
ग़ज़ल बहुत सुन्दर है श्रद्धा !! आप को शब के अन्धेरे ........इस शेर को थोड़ा और बेहतर कर सकती हो !!!

SHASHI PANDEY January 17, 2012 at 5:32 PM  

लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने
आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने..bahut umda..badhai swikaren.

Asi Bapu September 9, 2013 at 7:10 PM  

बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने


-बहुत खूब अपेक्षाए रखकर जीवन मेरा जला डाला मेने

www.blogvani.com

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