Wednesday, September 14, 2011

क्या कभी सोचे गए हम

अजनबी खुद को लगे हम
इस कदर तन्हा हुए हम

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम

खूबसूरत ज़िंदगी थी
तुम से मिलकर जब बने हम

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम

सुबह को आँखों में रख कर
रात भर पल - पल जले हम

खो गए हम भीड़ में जब
फिर बहुत ढूँढे गए हम

इस ज़मीं से आसमां तक
था जुनूँ उलझे रहे हम


जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम

लफ्ज़ जब उरियाँ हुए तो
फिर बहुत रुसवा हुए हम

जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम

तेरे सच को पढ़ लिया था
बस इसी खातिर मिटे हम

52 comments:

PRAN SHARMA September 14, 2011 at 11:20 PM  

AJNABEE KHUD KO LAGE HUM
IS TARAH TANHAA HUE HUM

CHHOTEE BAHAR AUR OONCHAA KHYAAL
HAR SHER KO UMDAA BANAA RAHAA HAI .

रचना दीक्षित September 14, 2011 at 11:39 PM  

जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम

तेरे सच को पढ़ लिया था
बस इसी खातिर मिटे हम.

बड़ी सुंदर गज़ल रची है आपने. बधाई.

shikha varshney September 14, 2011 at 11:44 PM  

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम
क्या बात है ..बहुत खूब.

डॉ. मनोज मिश्र September 15, 2011 at 12:15 AM  

@जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम
वाह,बहुत खूब.

Dr. shyam gupta September 15, 2011 at 12:30 AM  

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम---बहुत खूब ...क्या कहा है ...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' September 15, 2011 at 1:07 AM  

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम
हासिले-ग़ज़ल और तारीखी शेर हुआ है श्रद्धा जी, मुबारकबाद...
चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम
वाह...किस हुनर से बात कही है सुबहान अल्लाह.
हर शेर लाजवाब.

Dr Varsha Singh September 15, 2011 at 1:16 AM  

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम

सुबह को आँखों में रख कर
रात भर पल - पल जले हम

खूब....बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है.....

बारिशें September 15, 2011 at 1:36 AM  

जैसे खिडकी से पर्दा हते और भोर की नरम नरम धुप छू जाए ... खूबसूरत दो शोती वाली लड़की सी आपकी यह ग़ज़ल ... बधाई ...

नीरज गोस्वामी September 15, 2011 at 2:02 AM  

श्रद्धा जी अरसे बाद नज़र आयीं हैं और क्या ग़ज़ल कही है आपने...सुभान अल्लाह..छोटी बहर में कमाल कर दिया है आपने...बहुत से मासूम और नाज़ुक ख्यालातों को बेहद कारीगरी से शेरों में पिरोया है...वाह..

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम

जैसे शेर कहे नहीं जाते ऊपर से उतरते हैं...मेरी दिली दाद कबूल करें...

नीरज

नीरज गोस्वामी September 15, 2011 at 2:02 AM  

श्रद्धा जी अरसे बाद नज़र आयीं हैं और क्या ग़ज़ल कही है आपने...सुभान अल्लाह..छोटी बहर में कमाल कर दिया है आपने...बहुत से मासूम और नाज़ुक ख्यालातों को बेहद कारीगरी से शेरों में पिरोया है...वाह..

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम

जैसे शेर कहे नहीं जाते ऊपर से उतरते हैं...मेरी दिली दाद कबूल करें...

नीरज

विशाल September 15, 2011 at 10:28 AM  

लफ्ज़ जब उरियाँ हुए तो
फिर बहुत रुसवा हुए हम

बहुत खूब.

अरूण साथी September 15, 2011 at 11:55 AM  

अतिसुन्दर अभिव्यक्ति

भावपूर्ण रचना

सदा September 15, 2011 at 1:59 PM  

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम
बहुत खूब ।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" September 15, 2011 at 2:04 PM  

जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम

kyaa baat....kyaa baat....kyaa baat....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) September 15, 2011 at 6:39 PM  

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति!

दिगम्बर नासवा September 15, 2011 at 6:54 PM  

बहुत खूब ... मुझे टी हर शेर इतना पसंद आया की किसी एक को लिखना मुश्किल है ...
छोटी बहर में कमाल किया है आपने ..

"अर्श" September 16, 2011 at 1:09 AM  

अच्छी ग़ज़ल के लिये बधाई.... एक ही शे'र एक साथ दो लोग कैसे कह सकते हैं...


चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम


फिर समन्दर की चाहतें लेकर,
चाँद आंखों में आ गया होगा !

अर्श

Shayar Ashok : Assistant manager (Central Bank) September 16, 2011 at 10:30 PM  

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम

जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम

लाज़वाब गज़ल ,
यूँ तो हर शेर लाज़वाब है ,
पर ये दो शेर , जैसे दिल में उतर आया ||
दिल से बधाई ||

Manav Mehta September 17, 2011 at 1:35 AM  

bahut khoob..

Manav Mehta September 17, 2011 at 1:36 AM  

bahut khoob

singhSDM September 17, 2011 at 3:54 PM  

श्रद्धा जी

शानदार ग़ज़ल....... !!!!!

मुद्दत बाद आपका कलाम पढ़ा. कुछ शेर तो बिलकुल नए से हैं.... कथ्य में भी और विम्ब में भी !!!!


उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम

सुबह को आँखों में रख कर
रात भर पल - पल जले हम

तेरे सच को पढ़ लिया था
बस इसी खातिर मिटे हम

itef_lucknow September 20, 2011 at 6:43 PM  

बहुत सुंदर गज़ल, भावपूर्ण रचना

itef_lucknow September 20, 2011 at 6:43 PM  

भावपूर्ण रचना,सुंदर गज़ल

प्रदीप कांत September 22, 2011 at 11:41 PM  

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम

जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम

तेरे सच को पढ़ लिया था
बस इसी खातिर मिटे हम

बेहतरीन

Rajeev Bharol September 26, 2011 at 12:19 PM  

वाह. लाजवाब गज़ल.

Yatish October 2, 2011 at 2:41 PM  

जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम

बहुत खूब

डॉ.सोनरूपा विशाल October 13, 2011 at 11:10 AM  

बहुत प्यारी और उम्दा गजल है ....

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार October 14, 2011 at 7:45 PM  





आदरणीया श्रद्धा जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

अपनी स्थापित पहचान के अनुरूप बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने -

सुबह को आंखों में रख कर
रात भर पल-पल जले हम

लाजवाब शे'र !

जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम

बहुत मर्मस्पर्शी शे'र है !
…जिस पर बीती वह समझ सकता है यह दर्द !

जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम

जी करता है हर शे'र कोट करदूं … :)

बधाई और आभार इस ग़ज़ल के लिए !

दीपावली की अग्रिम बधाई और शुभकामनाओं सहित
-राजेन्द्र स्वर्णकार

Shishir Parkhie October 14, 2011 at 8:00 PM  

Nice!

Shishir Parkhie October 14, 2011 at 8:00 PM  

Nice!

Shishir Parkhie October 14, 2011 at 8:00 PM  
This comment has been removed by the author.
अनुपमा पाठक October 28, 2011 at 10:42 PM  

बहुत खूब!

अशोक कुमार शुक्ला November 7, 2011 at 11:45 PM  

आदरणीय श्रद्धा जी (शिल्पाजी)

आपको जन्म दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाऐं!
ईश्वर करे कि आपकी उम्र सौ वर्ष की हो और उसकी गिनती आज से प्रारंभ हो।

पुनः जन्मदिवस की बहुत बहुत शुभकामनाऐं।
इस अवसर पर आपके साथ एक महत्वपूर्ण
साहित्यिक उद्देश्य साझा करना चाहूँगा । बात यूँ है कि प्रेम की उपासक अमृता जी का हौज खास वाला घर बिक गया है। कोई भी जरूरत सांस्कृतिक विरासत से बडी नहीं हो सकती। इसलिये अमृताजी के नाम पर चलने वाली अनेक संस्थाओं तथा इनसे जुडे तथाकथित साहित्यिक लोगों से उम्मीद करूँगा कि वे आगे आकर हौज खास की उस जगह पर बनने वाली बहु मंजिली इमारत का एक तल अमृताजी को समर्पित करते हुये उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने के लिये कोई अभियान अवश्य चलायें। पहली पहल करते हुये भारत के राष्ट्रपति को प्रेषित अपने पत्र की प्रति आपको भेज रहा हूँ । उचित होगा कि आप एवं अन्य साहित्यप्रेमी भी इसी प्रकार के मेल भेजे । अवश्य कुछ न कुछ अवश्य होगा जन्म दिवस की बहुत बहुत शुभकामना के साथ महामहिम का लिंक है
08november 2011

महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है । कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें!!!!

मनीष कुमार ‘नीलू’ November 14, 2011 at 1:46 AM  

बहुत सुन्दर ग़ज़ल ...
बधाई हो !
मेरे ब्लॉग पे आपका हार्दिक स्वागत है ..
सदस्य बन रहा हूँ !

Mayank November 19, 2011 at 1:34 PM  

खूबसूरत ज़िंदगी थी
तुम से मिलकर जब बने हम
नया और बेहद खूबसूरत शेर सानी कमाल का कहा है --

सुबह को आँखों में रख कर
रात भर पल - पल जले हम
तश्बीह बहुत ताबिन्दा आयी --

खो गए हम भीड़ में जब
फिर बहुत ढूँढे गए हम
पसमंज़र और मर्क़ज़े ख्याल बहुत ही appealing है


जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम
निकल आये कहाँमंज़िल की धुन में //यहाँ बस रास्ता ही रास्ता है --निदा -इस के एक मुख़्तलिफ ज़ाविये पर तुम्हारा शेर भी बहुत अच्छा है --

लफ्ज़ जब उरियाँ हुए तो
फिर बहुत रुसवा हुए हम
the dignity of expression makes a man a human being ---शायरी रेशा ए गुल से तेशे का काम लेना और तितलीके पम्खों से फूलों पर शबनम कीकहानी लिखने का नाम्है -तुम कामयाब हो --जीती रहो!!!!

Mayank November 19, 2011 at 1:35 PM  

खूबसूरत ज़िंदगी थी
तुम से मिलकर जब बने हम
नया और बेहद खूबसूरत शेर सानी कमाल का कहा है --

सुबह को आँखों में रख कर
रात भर पल - पल जले हम
तश्बीह बहुत ताबिन्दा आयी --

खो गए हम भीड़ में जब
फिर बहुत ढूँढे गए हम
पसमंज़र और मर्क़ज़े ख्याल बहुत ही appealing है


जीस्त के रस्ते बहुत थे
हर तरफ रोके गए हम
निकल आये कहाँमंज़िल की धुन में //यहाँ बस रास्ता ही रास्ता है --निदा -इस के एक मुख़्तलिफ ज़ाविये पर तुम्हारा शेर भी बहुत अच्छा है --

लफ्ज़ जब उरियाँ हुए तो
फिर बहुत रुसवा हुए हम
the dignity of expression makes a man a human being ---शायरी रेशा ए गुल से तेशे का काम लेना और तितलीके पम्खों से फूलों पर शबनम कीकहानी लिखने का नाम्है -तुम कामयाब हो --जीती रहो!!!!

NUKTAA December 10, 2011 at 9:22 AM  

bahut sundar blog...behatareen rachna...उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम...wahhh

NUKTAA December 10, 2011 at 9:22 AM  

bahut sundar blog...behatareen rachna...उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम...wahhh

Rajput December 25, 2011 at 9:25 PM  

बहुत सुन्दर ग़ज़ल
बधाई !

मनीष सिंह निराला January 5, 2012 at 7:29 PM  

behtarin gajal...!
welcome on blog.

सदा January 10, 2012 at 6:24 PM  

वाह ...बहुत खूब

कल 11/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, उम्र भर इस सोच में थे हम ... !

धन्यवाद!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) January 11, 2012 at 12:54 PM  

बेहतरीन गजल।

सादर

Monika Jain "मिष्ठी" January 11, 2012 at 2:26 PM  

beautiful :)
Welcome to मिश्री की डली ज़िंदगी हो चली

Anand Dwivedi January 11, 2012 at 6:04 PM  

जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम

तेरे सच को पढ़ लिया था
बस इसी खातिर मिटे हम.....
श्रद्धा जी !
अचानक आपके ब्लॉग पर आकर लगा जैसे मुराद पूरी हो गयी हो ...यद्यपि आपको केवल कविता-कोष पर ही पढ़ा है मैंने ...मगर जितना भी पढ़ा है जी कर पढ़ा है ...आपके काफ़ी शेर फेसबुक पर मेरे स्टेटस की शोभा बढ़ा चुके हैं (आपके नाम और आपकी गरिमा के साथ ) प्रभु से विनती है कि अब जो भी आप पोस्ट करें उसे पढ़ता रहूँ ...सच में आप स्वयं प्रेम हैं !!

vidya January 11, 2012 at 7:11 PM  

बहुत सुन्दर श्रद्धा जी...
हर लफ्ज़ जानदार..
दाद पेश करती हूँ..

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) January 11, 2012 at 11:43 PM  

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम
जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम
सुबह को आंखों में रख कर
रात भर पल-पल जले हम
बड़ी ही प्यारी सी गज़ल में इन अश'आरों में जरा हट के ही बात कही गई है.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') January 12, 2012 at 12:48 AM  

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम.. वाह! वाह!

चाँद दरिया में खड़ा था
आसमाँ तकते रहे हम... बहुत उम्दा...

हर शेर बेशकीमती... बहुत ही उम्दा ग़ज़ल... आनंद आ गया आदरणीया श्रद्धा जी...
सादर.

Rakesh Kumar January 14, 2012 at 8:53 AM  

जागने का ख़्वाब ले कर
देर तक सोते रहे हम

तेरे सच को पढ़ लिया था
बस इसी खातिर मिटे हम

वाह! श्रद्धा जी,
बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
सदा जी की हलचल और आपका आभार.

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') February 26, 2012 at 10:32 PM  

मन के साहिल में हलचल मचाने में सक्षम...

------
..की-बोर्ड वाली औरतें।

pravesh soni April 12, 2012 at 4:26 PM  

उम्र भर इस सोच में थे
क्या कभी सोचे गए हम...

kamaal ke sher hai ,bahut hi ummda gazal hai Shradda ji ,mubarak ho aapko

mai... ratnakar June 4, 2012 at 7:07 PM  

चांद दरिया में खड़ा था
आसमां तकते रहे हम
बेहद उम्दा कृति बधाई

sylanisinh October 30, 2012 at 10:18 PM  

Its just great to read here...
TO READ MY HINDI POEMS KINDLY VISIT: http://mahanagarmemahakavi.wordpress.com/

www.blogvani.com

About This Blog