Monday, April 12, 2010

फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए

फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए
खुद-ब-खुद ग़ज़लों में अफ़साने तुम्हारे आ गए

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये
क्या तअज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर
लफ्ज़ में जाने कहां से ये शरारे आ गए

52 comments:

Apanatva April 13, 2010 at 12:03 AM  

bahut khoob .har sher ek se bad kar ek hai.
Aabhar

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' April 13, 2010 at 12:09 AM  

फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए
खुद-ब-खुद गजलों में अफ़साने तुम्हारे आ गए
वाह...कितना खूबसूरत मतला है...

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए..

श्रद्धा जी....दो महीने के इंतज़ार के बाद...
इतनी उम्दा ग़ज़ल तो मिलनी ही चाहिये थी.

Suman April 13, 2010 at 12:12 AM  

nice

जितेन्द़ भगत April 13, 2010 at 12:17 AM  

नयी-नयी सी लगी ये कल्‍पना-
रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए
इसलि‍ए सच ही कहा आपने कि-
मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर
लफ्ज़ में जाने कहां से ये अंगारे आ गए

श्याम कोरी 'उदय' April 13, 2010 at 12:35 AM  

....अदभुत ... एक से बढकर एक शेर ...बेहद प्रसंशनीय गजल!!!

girish pankaj April 13, 2010 at 12:41 AM  

pyaar me doobee ghazal ko dekh kar aisaa laga
door ho kar bhi mere apne sahaare aa gaye.
ho agar ''shrddhaa'' to dil se sher aise hee bane
isliye toh dekhiye hum bin pukare aa gaye...
badhai, shraddhaa, achchhi ...dil ko chhoo lene valee ghazal ke liye.

दिलीप April 13, 2010 at 1:22 AM  

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
in panktiyon ne dil jeet liya...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

sangeeta swarup April 13, 2010 at 1:30 AM  

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है ...एक एक शेर ..सवा सेर है...

वीनस केशरी April 13, 2010 at 1:32 AM  

श्रद्धा जी
बहुत बेहतरीन गजल पढवाने के लिए शुक्रिया

ये शेर खास पसंद आये

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर
लफ्ज़ में जाने कहां से ये अंगारे आ गए

आपको इक जरूरी ई मेल भेज रहा हूँ कृपया पढ़िए

वीनस

अशोक मधुप April 13, 2010 at 1:47 AM  

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
बहुत शानदार गजल
बधाई

Manish Kumar April 13, 2010 at 1:49 AM  

बहुत खूब! वाह वाह
यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन है पर ये शेर कुछ अलग अंदाज़ लिए हुए मिला।

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

Sanjeet Tripathi April 13, 2010 at 3:46 AM  

"हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए"

kyaa baat hai, lekin logo ko to tab bhi yakin nahi hota................

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) April 13, 2010 at 4:02 AM  

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

मोहब्बत का ये अन्ज़ाम होना भी सुखद है.. नही तो शादी हो जाती है फ़िर एक दूसरे को पत्थर मारते है :) बहुत बढिया शेर..

और ये वाला मेरा फ़ेव -
"मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर,लफ्ज़ में जाने कहां से ये अंगारे आ गए"

Udan Tashtari April 13, 2010 at 7:13 AM  

वाह! बहुत दिनों बाद पढ़ा..आनन्द आया. कहाँ हैं आजकल!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" April 13, 2010 at 9:18 AM  

हमेशा की तरह एक बेहतरीन ग़ज़ल ! श्रद्धा जी, आपकी हर ग़ज़ल बेहद उम्दा होती है ! पता नहीं आप इतना अच्छा कैसे लिख लेती है ! ये शेर तो कमाल का है ....

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए
हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

संजय भास्कर April 13, 2010 at 9:27 AM  

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

संजय भास्कर April 13, 2010 at 9:28 AM  

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Apanatva April 13, 2010 at 10:26 AM  

kal yanhaa maine comment dala tha ...........
aapka lekhan aur shavd chayan prabhavit kar gaya......

डॉ .अनुराग April 13, 2010 at 2:48 PM  

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

kya baat hai.....

ajit gupta April 13, 2010 at 3:36 PM  

अच्‍छी लगी आपकी रचना।

Vijay Kumar Sappatti April 13, 2010 at 4:17 PM  

shradda ji

deri se aur bahut dino baad aane ke liye maafi chahunga ..

aapki gazal padhi , shaare hi sher man ko choo gaye .. leki ek sher ne mujhe bahut der tak rok liya ...
उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
....is sher ke liye mai aapki lekhni ko salaam karta hoon ..badhayi sweekar kare..

aabhar

vijay
- pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

निर्झर'नीर April 13, 2010 at 5:58 PM  

ek se badhkar ek sher samajh hi nahi aaya ki kisko sabse sundar kahoon jab jisko padho vo hi sabse sundar .

bandhaii swikaren



फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए
खुद-ब-खुद गजलों में अफ़साने तुम्हारे आ गए

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

Mukesh Kumar Sinha April 13, 2010 at 6:36 PM  

मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर
लफ्ज़ में जाने कहां से ये अंगारे आ गए
.
aap sher k duniya ke sartaj jald hi banoge.........:)bahut khub!!

अभिषेक'शफक़' April 13, 2010 at 10:22 PM  

Shraddha Ji .. Ek behad umda ghazal kehne par Bahut Bahut Badhai .. Shubhkamnayein.

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

oola misre kii bunaavat par ek nazar dobaara dijiyega, waise sher behtareen hai.

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

wah .. wah .. kya sher hai .. wah

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

kya sher kaha hai .. Bahut khoob
Khumaar Sahab ka ek sher yaad aa gaya ..

"Elahi mere dost houn khairiyat se,
ye kyon ghar mein patthar nahin aa rahe hain
"

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

achcha hai ..

मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर
लफ्ज़ में जाने कहां से ये अंगारे आ गए

Kripaya saani misre par ek baar dobaara nazar daliyega.

Ek Khoobsurat ghazal :)

M VERMA April 13, 2010 at 10:27 PM  

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
हश्र हर पेड का यही होता है
खुशी देकर औरो को खुद रोता है

डॉ. मनोज मिश्र April 13, 2010 at 11:55 PM  

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए..
VAAH...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक April 14, 2010 at 12:01 AM  

आपकी इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा यहाँ भी तो है-
http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_13.html

सुशील कुमार छौक्कर April 14, 2010 at 12:26 AM  

वाह। वैशक दिनों के बाद आती है पर गजल बेहतरीन लाती है।

दिगम्बर नासवा April 14, 2010 at 12:48 AM  

हमको तब अपनी मुहब्बत पर हुआ जाकर यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
Vaah .. kya andaaz hai kahne ka ... vo muhabbat hi kya jo badnaam na ho .. lajawaab ...

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
ye hakeekat bayaan ki hai aapne sansaar ki .. aaj ki reet yahi hai .. ghar ghar ki yahi kahaani hoti ja rahi hai ...

aapki gazlon mein yathaarth ki khushboo lipti huyi hai .. jo ise aur bhi nikhaar deti hai ...

Setu Gupta April 14, 2010 at 10:32 AM  

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए...

Really very nice.

शारदा अरोरा April 14, 2010 at 10:57 AM  

आहा ,क्या खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है
फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए ....
खुशबुएँ आने लगती हैं तो हमेशा की तरह हाथों में पत्थर भी आ जाते हैं ..और जैसे कोई नींद से जगा हो ...
हम आपके लिंक को जज्बात के साइड-बार से चुराए लिए जा रहे हैं |

Shayar Ashok April 14, 2010 at 12:43 PM  

फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए
खुद-ब-खुद गजलों में अफ़साने तुम्हारे आ

वाह...क्या मतला है...

हर शेर लाजवाब .... बहुत खूब !!
मज़ा आ गया ....पढ़कर....

manav vikash vigyan aur adytam April 14, 2010 at 3:07 PM  

bahoot khoob

सर्वत एम० April 14, 2010 at 5:54 PM  

इतनी जानदार-शानदार गजल देखकर हीं भावना का शिकार तो होना ही था. किस-किस शेर की तारीफ करूं और किसे छोड़ दूं, यह जब समझ में नहीं घुसा तो कमेन्ट बॉक्स का रुख किया. आधा घन्टा तो यह सोचने में लग गया कि कहना क्या है. अंत में यही तय किया कि सच बोलो. किसी ने कहा है----
"हम मोत्किदे मेरे नहीं हैं, कहता मुआफ
ऐसी भी क्या गजल जो कलेजा निकल दे".
मैं भी यही कह रहा हूँ कि जिस गजल से हम जैसे जल भुन कर खाक हो जाएँ, फिर उसकी तारीफ किस मुंह से करें. अब आप उस्तादों की सफ में बैठ चुकी हैं, बधाई.
मैं अपनी कुछ रचनाएँ संशोधन के लिए भेजूं क्या?

अमित April 15, 2010 at 1:16 AM  

श्रद्धा जी,
उम्दा ग़ज़ल!
रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए
हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

ये अश’आर खास तौर पर पसन्द आये। गज़लों पर आपकी रवानी दिनोदिन बढ़ती जा रही है।
सादर

अरुणेश मिश्र April 15, 2010 at 11:29 AM  

............वे ले के आरे आ गये - बेजोड़ ।

आशीष/ ASHISH April 15, 2010 at 11:42 AM  

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए..
Achook!

संत शर्मा April 15, 2010 at 5:26 PM  

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

उफ़ लाजबाब :) ग़ज़ल दर ग़ज़ल आपके सोच की गहराई बढती ही जाती है, इसे यू ही बनाये रखें |

इस्मत ज़ैदी April 15, 2010 at 6:50 PM  

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

श्रद्धा जी ,
बहुत उम्दा शेर है,मानी के ऐतबार से ख़ास तौर पर,

फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए
खुद-ब-खुद ग़ज़लों में अफ़साने तुम्हारे आ गए

इस शेर में ’ख़ुद ब ख़ुद’का इस्तेमाल शेर में जान डाल देता है,

बहुत ख़ूब!

"अर्श" April 16, 2010 at 12:42 AM  

दूसरे तरीके से मैं ग़ज़ल को तब कामयाब मानता हूँ , जब आपकी ग़ज़लों के बारे में कोई दूसरा बात करे किसी तीसरे से ( आपस में चर्चा ) ! या तो फिर आप अपने ग़ज़ल में कुछ ऐसे अश'आर तो कहें के जिसे लोग पसंद करें , और यहाँ ये दोनों बातें हुई .! बहुत देर तक मैं श्रधेय सरवत जी से आपकी ग़ज़ल के बारे में चर्चा करता रहा ... और दूसरी बात ये के शे'र कामयाब निकले हैं..
पुख्तगी है मिसरों में ... और इसी बहाने उनसे कुछ सिख भी लिया ...
मेरे गुरु देव कहते हैं कहन का बहुत बड़ा हाथ होता है ग़ज़ल की कामयाबी में ...
यहाँ वो बात परिलक्षित हो रही है ....

और सरवत जी ने अपनी टिपण्णी में जो आखिरी लाइन लिखा है उससे रश्क हो रहा है मुझे सखी

खुबसूरत अहसासात वाला मिसरा जमानत है इस ग़ज़ल के लिए...

आपका
अर्श

MUFLIS April 16, 2010 at 12:45 AM  

हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

जी....
ऐसा शानदार शेर...आपकी क़लम के नसीब में ही हो सकता है
और...वो "आरे" का इस्तेमाल.....तौबा
कभी कहीं देखा ना सुना

सोचता हूँ....कह दूं ...
बता ये हुनर तूने.....सीखा कहाँ से....

मुबारकबाद .

rajeevspoetry April 16, 2010 at 10:55 AM  

श्रद्धा जी,
आपकी सभी ग़ज़लें और सभी शेर इतने अच्छे हैं की किसी एक शेर या ग़ज़ल की तारीफ बाकि ग़ज़लों के साथ ज्यादती होगी.

बहुत सुंदर. एक से बढ़ कर एक!

-राजीव भरोल

Ankit Joshi April 16, 2010 at 5:08 PM  

श्रद्धा जी,
एक बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई, मिसरे से लेके मखते तक हर शेर लाजवाब है.
मतला शुरुआत से ही समां बाँध दे रहा है, इस शेर के क्या कहने......

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

ऋषिकेश खोङके "रुह" April 16, 2010 at 8:11 PM  

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये
क्या तअज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

बहुत ही उम्दा अशआर है , मन को छुने वाली पंक्तिया | आप को साधुवाद

ऋषिकेश खोङके "रुह" April 16, 2010 at 8:16 PM  

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये
क्या तअज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

बहुत ही उम्दा अशआर है , मन को छुने वाली पंक्तिया | आप को साधुवाद

dipayan April 18, 2010 at 3:59 AM  

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसल
क्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

लाज़वाब शेर । वैसे तो आपके हर शेर मे गहराई है, और हर शेर उम्दा । बधाई स्वीकारे ।

सुशीला पुरी April 19, 2010 at 3:42 AM  

खुद -ब खुद उनका अफसानों मे आ जाना !!!!! कितना अज़ीज़ और कितना लज़ीज़ है ???

हरकीरत ' हीर' April 19, 2010 at 1:29 PM  

हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

बहुत खूब ......!!

ये मज़ेदार कही आपने .....मुहब्बत हो तो ऐसी .....!!

SINGHSADAN April 19, 2010 at 3:29 PM  

श्रद्धा मैम.....
अच्छे मतले पर लिखी गयी ग़ज़ल.......शेर भी खूब बन पड़े हैं......!

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए
वाह वाह.......!

आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये
क्या तअज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए
क्या विम्ब खींचा है आपने......!

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
बहुत अच्छे......!
कुछ इसी ख्याल को मैंने भी अपनी लास्ट ग़ज़ल में परोसा था शायद शेर पसंद आया हो.....(काट डाला उसी पेड़ को एक दिन, उम्र भर जिसके साए में सोते रहे.......!)

Dinesh Dadhichi April 20, 2010 at 1:54 PM  

निहायत खूबसूरत ग़ज़ल !

saloni April 20, 2010 at 8:47 PM  

bahut khubsurat

प्रदीप कांत April 23, 2010 at 10:34 PM  

रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

बेहतरीन शेर

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