Thursday, February 11, 2010

क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़

पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़
क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं खुदा के चराग़

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़

लम्स- स्पर्श

91 comments:

amritwani.com February 11, 2010 at 9:03 PM  

बहुत सटीक गजल हे

संजय भास्कर February 11, 2010 at 9:20 PM  

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर February 11, 2010 at 9:21 PM  

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

हृदय पुष्प February 11, 2010 at 9:24 PM  

"ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़"
...
"उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़"

"जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि" कहावत को चरितार्थ करती हुई शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई

सर्वत एम० February 11, 2010 at 9:35 PM  

अब मुझे उस वक्त को याद करके खौफ महसूस होता है जब मैं ने आपसे कहा था कि थोडा सुधार पैदा कीजिए. मुझे अब लगता है कि आप पहले से ही गजल में माहिर थीं, सिर्फ लोगों का इम्तिहान ले रही थीं. शायद आप भी एक कारक हैं जो प्रार्थी गजलों से पीछा छुड़ा कर भाग रहा है.
आप का फन, हुनर और बर्ताव काबिले-तारीफ है.

परमजीत बाली February 11, 2010 at 9:38 PM  

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

महेन्द्र मिश्र February 11, 2010 at 9:41 PM  

बेहतरीन सटीक गजल प्रस्‍तुति...

HARI SHARMA February 11, 2010 at 10:23 PM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़


bahut khoob

नीरज गोस्वामी February 11, 2010 at 10:28 PM  

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

श्रद्धा जी...कहाँ तो ग़ज़ल में एक ढंग का शेर कहने में नानी याद आ जाती है और कहाँ आपने हर शेर कमाल का कहा है इस ग़ज़ल में...आपका फन दिनों दिन निखरता जा रहा है...मुझे यकीन है शायरी की दुनिया में आप अपना नाम बुलंद करेंगी...

नीरज

shikha varshney February 11, 2010 at 11:07 PM  

Behatareen Gazal Shradha ji!

RaniVishal February 11, 2010 at 11:58 PM  

बढ़िया गजल हे.....शुभकामनायें!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

डॉ. मनोज मिश्र February 12, 2010 at 12:09 AM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़..
behad khoobsoorat.

"अर्श" February 12, 2010 at 12:19 AM  

क्या कहूँ शब्द जैसे लूटा चुका हूँ हर शे'र पर .... सखी .. :)
सुना है पूरी ग़ज़ल कभी मुकम्मल नहीं बनती मगर ये कहावत झूट कर दिया आपने ... लोग कहते हैं के ग़ज़ल में दो तीन शे'र सही बन जाये तो ग़ज़ल मुकम्मल समझी =जाती है मगर यहाँ तो सारे ही शे'र कमाल के हैं ...
मतला अलग ही कहर बरपा रहा है , और दुसरे शे'र को जिस तरह से आपने कहा है व उसके लिए तो क्या कहूँ समझ ही नहीं आरहा है ... हासिल ग़ज़ल शे'र है यह ... और कोट किया जा सकता हिया ...
और ये लम्स / इस शे'र पे कुछ भी कहना नाज़ुकी से पंगा लेना है मैं नहीं कर सकता ... हाय रे वाली बात है इस शे'र में तो ...


रश्क हो रहा है सखी आपकी ग़ज़लों से इस बारी तो ... :)
...
ब्लॉग चेंज अच्छा लग रहा है
अर्श

pragya pandey February 12, 2010 at 12:38 AM  

bahut sunder prastuti hai aap chhote chhote dardon ko utaa deti hain .. iss sunde achana ke liye bahut badhayi

सुरेन्द्र "मुल्हिद" February 12, 2010 at 1:11 AM  

kamaal ki baat hai ji..

श्याम सखा 'श्याम' February 12, 2010 at 1:19 AM  

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़
sundar ati sunder

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' February 12, 2010 at 1:41 AM  

श्रद्धा जी, आदाब
नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़
...समाज की हक़ीक़त को बयान करता शेर.

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़
कितना खूबसूरत, और पाकीज़ा शेर कहा है.
बस ऐसा ही लिखती रहें, मुबारकबाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक February 12, 2010 at 1:50 AM  

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक February 12, 2010 at 2:14 AM  

सुन्दर रचना!

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

Udan Tashtari February 12, 2010 at 2:57 AM  

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

-वाह! बहुत उम्दा शेर निकाले हैं आपने. आनन्द आ गया. बधाई.

इस्मत ज़ैदी February 12, 2010 at 2:59 AM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं खुदा के चराग़

bahut khoob shraddha ji ,samaj ki aur mamta ki bahut achchhi tasveer pesh ki hai .

Razi Shahab February 12, 2010 at 3:22 PM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़
हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन

अरूण साथी February 12, 2010 at 4:34 PM  

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़
बहुत सुन्दर

महाशिवरात्री की मंगलकानाऐं

दिगम्बर नासवा February 12, 2010 at 5:21 PM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

बहुत ही दूर तक जाने वाला है ये शेर .... हक़ीकत बयान कर रहा है ... आपकी ग़ज़लों की ताज़गी बहुत लुत्फ़ देती है ....
.... आपको महा-शिवरात्रि की बहुत बहुत बधाई .....

Dr. shyam gupta February 12, 2010 at 6:50 PM  

इसे कहते हैं---वेलेन्टाइन गिफ़्ट.

Apanatva February 12, 2010 at 9:02 PM  

Bahut acchee lagee aapkee gazal.......

kishor kumar khorendra February 12, 2010 at 11:28 PM  

bahut bahut bahut .......achchhi gajal

sadaa roshan rahe teri vafaa ke charaag

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़"
isii tarah likhatii rahe
har baar
har baat
jisme mile ho aapke
bas aapke apane likhane ka

maulik andaaj ...

vah ..aapne mera dil jiit liyaa

शायरी की दुनिया में आप अपना नाम बुलंद करेंगी...

हर she"r में गहराई, बहुत ही बेहतरीन

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़..

kishor

अमित February 13, 2010 at 5:48 AM  

बेहद उम्दा ग़ज़ल है श्रद्धा जी। आपकी ग़जलों में दिनो-दिन उस्तादना फ़न जाहिर हो रहा है।
बधाई! ईकविता को भी आपकी ग़ज़लों का इन्तेजार है।
सादर

अमिताभ मीत February 13, 2010 at 6:52 AM  

पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़
क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

बस ये दो शेर तो इस लिए लिखा यहाँ कि पूरी ग़ज़ल कैसे लिखूं ..... हर शेर लाजवाब है .... किस किस की तारीफ़ हो ?

योगेश स्वप्न February 13, 2010 at 10:02 AM  

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़


wah wah wah sabhi ek se badh kar ek, lajawaab.

psingh February 13, 2010 at 1:33 PM  

बहुत सुन्दर रचना
बधाई स्वीकारें

knkayastha February 13, 2010 at 6:38 PM  

पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़
क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़...

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़...


उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़...


क्या खूब लिखा है...लम्स का अर्थ बतायेंगी...कृपा होंगी...

राज भाटिय़ा February 13, 2010 at 7:22 PM  

बहुत सुंदर गजल
धन्यवाद

सतपाल ख़याल February 13, 2010 at 8:24 PM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़
jiyo...kya baat hai..jiyo...

manav vikash vigan aur adhatam February 14, 2010 at 2:59 PM  

bahoot achhi gajal hai

sanjeev kuralia February 14, 2010 at 3:49 PM  

बहुत उम्दा ख़याल समेटे हुए खूबसूरत ग़ज़ल ......! मुबारक हो

रावेंद्रकुमार रवि February 15, 2010 at 12:14 AM  

बहुत बढ़िया बात कही है -

"करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन!
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं ख़ुदा के चराग़!!

--
कह रहीं बालियाँ गेहूँ की - "वसंत फिर आता है - मेरे लिए,
नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा!"
--
संपादक : सरस पायस

कंचन सिंह चौहान February 15, 2010 at 3:45 PM  

मैं जब जब आपको पढ़ती हूँ, सब से बड़ी समस्या ये होती है कि बेहतरीन किस शेर को कहूँ....! सब एक से बढ़ कर एक होते हैं...!

शहरोज़ February 16, 2010 at 10:31 PM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं खुदा के चराग़

kya kahna hai!! besaakhtaa waah!! waah !! nikalta hai!!

सुशीला पुरी February 16, 2010 at 11:18 PM  

''नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़''
waah kitni sundar line likhi aapne ....hardik badhai.

M VERMA February 17, 2010 at 12:27 AM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

बहुत खूबसूरत गज़ल

दिल की रोशनी से दिल की किताब पढ़्ना है
सहारा मत देना अभी बहुत ऊँचाई चढ़ना है

गौतम राजरिशी February 19, 2010 at 2:42 PM  

हुम्म...मैंने जब कहा था कि अब इन ग़ज़लों को एक संकलन की शक्ल दे दीजिये तो आपको लगा कि मैंने यूं ही कह डाला था।

प्लीज कुछ कीजिये इस बारे में।

"ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़"

अभी तक के पढ़े-सुने गये तमाम बेहतरीन अशआरों में से एक है मेरी फ़ेहरिश्त में।

भूतनाथ February 21, 2010 at 7:39 PM  

phir main vahin gayaa tha aaj
phir mujhe majaa aa gayaa aaj....!!

PRAN SHARMA February 21, 2010 at 9:30 PM  

ACHCHHEE GAZAL ISE KAHTE HAIN.
BAHUT-BAHUT BADHAAEE.

बेचैन आत्मा February 22, 2010 at 12:26 AM  

करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं खुदा के चराग़
..वाह!

ललितमोहन त्रिवेदी February 22, 2010 at 1:01 AM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़

श्रृद्धा जी ! नाज़ुक खयाली के ऐसे बेहतरीन शे'र कभी कभी ही पढ़ने को मिलते हैं ,सचमुच आप सिद्धहस्त हैं इसमें ! इस शे'र की जितनी भी तारीफ की जाय कम है !आपको पढना बहुत पुरसुकून लगता है !

singhsdm February 22, 2010 at 1:53 PM  

श्रद्धा जी
बहुत शानदार ग़ज़ल खासकर यह शेर बहुत अच्छे लगे


नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

पुन: वाह वाह....

MUFLIS February 22, 2010 at 8:25 PM  

मुरस्सा ग़ज़ल का क़ीमती नमूना ....
हर शेर अपने आप में मुकम्मिल नज़र आ रहा है
आपकी अपनी इनफरादियत
आपकी अलग पहचान बनाने में कामयाब है
अलग-अलग मौज़ूआत को खुद में समेटे हुए
सारे अश`आर अपनी मिसाल आप बन पड़े हैं
मुबारकबाद ...

सभी के दिल को छुआ, रौशनी से भर डाला
निज़ाम-ए-फ़न को भी रौशन किया, जला के चराग

Babli February 22, 2010 at 10:21 PM  

वाह बहुत ही ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

श्याम कोरी 'उदय' February 22, 2010 at 11:15 PM  

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़
....उम्दा ...लाजबाब ... सभी शेर एक से बढकर एक, बेहद प्रसंशनीय गजल,बधाई !!

प्रकाश पाखी February 23, 2010 at 12:13 AM  

वाह !श्रद्धा जी...
पूरी गजल जबरदस्त है..कम से कम चार शेर तो ऐसे है जो दिल में उतर गए है...
1
पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़
क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़

मतला बहुत सुन्दर है..
2
ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

कितना नाजुक है यह शेर बिलकुल गजल की आत्मा सा..
3
करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं खुदा के चराग़
4
उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़

उफ्फ्फ !गजब ...!!
आप बहुत श्रेष्ठ लिखती है...हम आपकी गजलों के मुरीद है...!!!

Pankaj Upadhyay February 23, 2010 at 10:16 AM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

उफ़्फ़..क्या कह डाला आपने...सारे ही शेर just awesome..

KK Yadava February 25, 2010 at 8:36 PM  

बेहद खूबसूरत भावाभिव्यक्ति...शब्दों की अद्भुत संगति..भावपूर्ण रचना..बधाई.
______________
शब्द सृजन की ओर पर पढ़ें- "लौट रही है ईस्ट इण्डिया कंपनी".

हरकीरत ' हीर' February 25, 2010 at 11:41 PM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़"
...
"उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़"

har baar ki tarah ....lajwaab.....!!

NEER February 26, 2010 at 8:04 PM  

very nice shardha ji........

hr word meaningful hota hai apki kavita ka....

kshama February 27, 2010 at 2:40 PM  

Bahut sundar rachana!Alfazon kee mohtaji hai!
Holi ki shubhkamnayen!

गिरीश पंकज February 27, 2010 at 11:17 PM  

itane pyare-pyare sher ...? tum par shrddhaa ho rahi hai. desh ke baahar rah kar bhi desh se jude rahane kee lalak dekh kar khushi hui. sahity se jude rahana matalab desh se hu jude rahanaa hai.

Babli February 28, 2010 at 9:20 PM  

आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

सतीश सक्सेना March 1, 2010 at 12:39 AM  

होली पर आपको सपरिवार शुभकामनायें !

manu March 1, 2010 at 11:51 PM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

ये शे'र कुछ और नहीं पढने देगा...
कमाल का है..

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' March 2, 2010 at 4:01 AM  

श्रद्धा जी, आदाब
होली की हार्दिक शुभकामनाएं
ये रंग विश्वास के हमेशा बरसते जाएं मेरे वतन में
रिफ़ाक़तों की यें गंगा-जमना न सूख पाएं मेरे वतन में.

गर्दूं-गाफिल March 2, 2010 at 4:02 AM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़
vah vah vah vah
होली पर आप के लिए रंग अबीर लिए आया हूँ


रंग लेकर के आई है तुम्हारे द्वार पर टोली
उमंगें ले हवाओं में खड़ी है सामने होली

निकलो बाहं फैलाये अंक में प्रीत को भर लो
हारने दिल खड़े है हम जीत को आज तुम वर लो
मधुर उल्लास की थिरकन में आके शामिल हो जाओ
लिए शुभ कामना आयी है देखो द्वार पर होली

Indranil Bhattacharjee March 2, 2010 at 11:00 AM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

Zindagi ke haqiqat ko kitni achhi tarah bayan kiya hai apne ! Sach kehta hu...dil ko chun gaya !

Kishore Choudhary March 2, 2010 at 2:23 PM  

कई बार मुझे लगता है कि आपके यहाँ आया हूँ या डॉक्टर बद्र साहब का मुशायरा है. अभिभूत कर देने वाले शेर है.

Babli March 2, 2010 at 2:37 PM  

आपको और आपके परिवार को होली की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

Vivek VK Jain March 2, 2010 at 3:34 PM  

aapki to har gazal umda hoti h....

लता 'हया' March 3, 2010 at 5:45 AM  

shukria,
wah shradha ji aapki sab gazalein aur nazm qabile-tareef hain ,itne khubsurat ashaar,itne nazuk jazbaat...wah .tabiyat khush ho gayi.

निर्मला कपिला March 4, 2010 at 10:53 PM  

ेअरे श्रद्धा जी मै ही कैसे पीछे रह गयी इतनी सुन्दर गज़ल पढने से। लाजवाब प्रस्तुती हमेशा की तरह।
नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़
वाह क्या सही बात कही
ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़
श्रद्धा जी आपकी बहुआयामी प्रतिभा की कायल हूँ। बहुत सुन्दर लिखती हैं आप। शुभकामनायें

योगेन्द्र मौदगिल March 7, 2010 at 7:54 PM  

wah shraddha ji, behtreen sher nikale hain aapne. sadhuwaad...

manav vikash vigyan aur adytam March 8, 2010 at 6:44 PM  

keya khoob likha hai danyavaad

संत शर्मा March 9, 2010 at 12:27 AM  

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़

Lajabab lekhan.

गिरीश बिल्लोरे ''पॉडकास्टर'' March 11, 2010 at 4:09 AM  

sabase sundar sher
कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

kshama March 12, 2010 at 1:21 AM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़
kya gazab khazana hai yahan..phir ekbaar padhne chali aayi hun..

kumar zahid March 12, 2010 at 12:47 PM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़

एक से बढ़कर एक ...

एक रोशनी में आया सा लगा.. ब्लाग में आकर चराग जलाने का शुक्रिया..

अक्षिता (पाखी) March 12, 2010 at 7:16 PM  

बहुत सुन्दर लिखा...बेहतरीन रचना !!
______________

"पाखी की दुनिया" में देखिये "आपका बचा खाना किसी बच्चे की जिंदगी है".

pallavi trivedi March 13, 2010 at 11:34 PM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़
बहुत बढ़िया ग़ज़ल....बहुत दिन बाद तुम्हे पढ़ा ! अच्छा लगा!

Yatish March 20, 2010 at 3:09 PM  

जलेगे जलने वाले पर
रौशन रहेंगे श्रद्धा के चराग़

Vijay Pratap Singh Rajput March 24, 2010 at 1:15 PM  

पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़
क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़
बढ़िया प्रस्तुति बहुत सटीक गजल हे

Mukesh Kumar Sinha March 24, 2010 at 3:59 PM  

bahut khubsurat prastuti........:)

निर्झर'नीर March 26, 2010 at 5:13 PM  

नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़

koi javab nahi laajavab sher

शहरोज़ March 29, 2010 at 10:42 PM  

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

हिमान्शु मोहन April 4, 2010 at 12:45 AM  

बेहतरीन ग़ज़लकारी मिली आपके यहाँ, श्याम सखा 'श्याम' जी के ब्लॉग से होता हुआ आया, फ़ॉलो कर लिया, आगे भी आता रहूँगा।

tadap April 4, 2010 at 2:33 PM  

its nice to see u here...
sameer aggarwal...(tadap)...

http://www.tadap-tadap.blogspot.com/

irshad April 7, 2010 at 11:33 AM  

achhi gazal ke liye mubaraq bad

सर्वत एम० April 9, 2010 at 7:00 PM  

एक लम्बे अंतराल पर आपके ब्लॉग का दर्शन किया और दुखी हो गया. कुछ मन्दिरों के बारे में पढ़ा था कि वहां हमेशा चराग जलते रहते हैं.
आपका ब्लाग भी शायद अब मन्दिर बन रहा है जहाँ चराग बुझने का नाम ही नहीं लेता.
एक मशवरा है, अभी कुछ दिनों तक इसे छूइए-छेडिएगा मत. कमेंट्स के शतक में थोड़ी सी कसर है. अवसर चूकिएगा मत. अभी नहीं तो कभी नहीं----
यह कहावत ध्यान में रखिए.
आशा है आप इस मुफ्त की सलाह का फायदा जरूर उठाएंगी.

Shayar Ashok April 14, 2010 at 12:48 PM  

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

वाह !! वाह !! ....
इस शेर पर सारा जहां कुर्बान

प्रदीप कांत April 23, 2010 at 10:36 PM  

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

वाह

विनोद शर्मा June 29, 2010 at 4:16 PM  

श्रद्धाजी, आपके पुराने पोस्ट फिर से पढ रहा हूँ। आपका शब्द-चयन अद्भुत है। जैसे-किताब-ए-ज़िस्म,खुदा के चराग़।

ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़

करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं खुदा के चराग़

उजाला बांटना आसान तो नहीं 'श्रद्धा'
चली हैं आंधियां जब भी रखे जला के चराग़

एक-एक लफ्ज दिल को छू जाता है। इसीलिये तो हम आपके दीवाने हैं।

Ojaswi Kaushal August 24, 2011 at 6:17 PM  

Hi I really liked your blog.

I own a website. Which is a global platform for all the artists, whether they are poets, writers, or painters etc.
We publish the best Content, under the writers name.
I really liked the quality of your content. and we would love to publish your content as well. All of your content would be published under your name, so that you can get all the credit for the content. This is totally free of cost, and all the copy rights will remain with you. For better understanding,
You can Check the Hindi Corner, literature and editorial section of our website and the content shared by different writers and poets. Kindly Reply if you are intersted in it.

http://www.catchmypost.com

and kindly reply on mypost@catchmypost.com

Dan November 16, 2012 at 2:09 AM  

श्रद्धा जी, आदाब नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़ ...समाज की हक़ीक़त को बयान करता शेर. कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़ कितना खूबसूरत, और पाकीज़ा शेर कहा है. बस ऐसा ही लिखती रहें, मुबारकबाद

Dr. shyam gupta November 16, 2012 at 3:37 PM  

आपकी ग़ज़ल हुए रोशन दिल के चराग
अंधेरों में जल उठे गोया कि यादों के चराग

www.blogvani.com

About This Blog