Sunday, January 24, 2010

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया

गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

अज़ाब – punishment / Pain
सराब- Illusion
आफताब- Sun

75 comments:

अमिताभ मीत January 24, 2010 at 12:17 PM  

बहुत खूब . हर शेर लाजवाब. क्या बात है.

ह्रदय पुष्प January 24, 2010 at 12:47 PM  

शानदार ग़ज़ल के लिए धन्यवाद्
------
कौन था वो शख्स ये खुदा जाने
आभार उसका दिल में ऐसे भाव छोड़ गया

Mithilesh dubey January 24, 2010 at 1:30 PM  

क्या बात है जी, लाजवाब, बेहद उम्दा गजल लगी ।

"अर्श" January 24, 2010 at 2:02 PM  

मतला पढ़ते ही आनंद के जिस रस में डूबा हुआ हूँ उसका अंदाज़ा आप नहीं लगा सकती,,...
पूरी ग़ज़ल में डूबता उतरता रहा ... हर शे'र कमाल का

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
इस शे'र के क्या कहने जीतनी तारीफ़ करूँ कम है...

गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया
इन दोनों शे'रों पर मेरे सारे लिखे कुर्बान ... कमाल की शायरी जी कमाल की ...

सुबह सुबह मजा आगया.....


अर्श

शुभम जैन January 24, 2010 at 2:49 PM  

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया

bahut sundar...

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Razi Shahab January 24, 2010 at 2:51 PM  

गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया
vaah bahut khoob

महफूज़ अली January 24, 2010 at 3:44 PM  

ग़ज़ल बहुत सुंदर लगी....

आभार...

Manish Kumar January 24, 2010 at 3:46 PM  

bahut achche khaskar maqta to kamaal likha aapne..

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

Dr. Amar Jyoti January 24, 2010 at 4:07 PM  

'नज़र मिली तो……'
बहुत ख़ूब!
बधाई।

HEY PRABHU YEH TERA PATH January 24, 2010 at 4:08 PM  

शानदार ग़ज़ल

दिगम्बर नासवा January 24, 2010 at 4:09 PM  

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया ..

हर शेर पर सुभान अल्ला निकलता है ........ ग़ज़ब के शेर हैं सारे .......

sanjeev kuralia January 24, 2010 at 4:30 PM  

बहुत उम्दा ग़ज़ल ....बधाई !

sanjeev kuralia January 24, 2010 at 4:31 PM  

बहुत उम्दा ग़ज़ल ....बधाई !

sanjeev kuralia January 24, 2010 at 4:31 PM  

बहुत उम्दा ग़ज़ल ....बधाई !

Lalit Kumar January 24, 2010 at 4:48 PM  

तारीफ़ में अब कहने को शब्द बाकि ही नहीं रहे हैं। तारीफ़ में कुछ भी लिखने के बारे में सोचता हूँ तो याद आता है कि यह तो मैं पहले भी कह चुका हूँ। इसलिये बस इतना ही कहूँगा कि मेरी अर्से पुरानी इल्तिजा पर जल्दी ही ध्यान दीजिये और अपनी किताब ज़रूर छपवाइये। सबसे खूबसूरत शेर आखिरी वाला लगा।

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

राज भाटिय़ा January 24, 2010 at 4:50 PM  

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया
आप की गजल के सारे शेर एक से बढ कर एक लगे, बहुत खुब, लेकिन एक शेर ने किसी की याद ताजा कर दी.
धन्यवा्द

अनिल कान्त : January 24, 2010 at 4:51 PM  

wow !
Mazaa aa gaya

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' January 24, 2010 at 5:03 PM  

श्रद्दा जी, आदाब
बहुत बुलंद शायरी का सबूत दे रहा है ये मतला-
अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया
हर शेर यादगार,
ये खास तौर पर-
उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया
ज़िन्दाबाद......
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

pragya pandey January 24, 2010 at 5:23 PM  

क्या खूब लिखतीं हैं आप हम आपकी लेखनी के कायल हैं .. हर लफ्ज़ में असर है जादू है

सुरेन्द्र "मुल्हिद" January 24, 2010 at 6:29 PM  

aafareen...

नीरज गोस्वामी January 24, 2010 at 7:30 PM  

श्रद्धा जी मतला क्या लिख डाला है दो मिसरों में पूरी ग़ज़ल लिख डाली है...वाह...बाकि के सारे शेर भी गज़ब के हैं....वाह श्रद्धा जी बहुत बहुत बधाई इस शानदार ग़ज़ल के लिए.
नीरज

अरूण साथी January 24, 2010 at 9:01 PM  

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

बहुत सुन्दर गजल—
बधाई।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक January 24, 2010 at 9:03 PM  

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया

गजल का हर शेर लाजवाब है!

योगेश स्वप्न January 24, 2010 at 11:04 PM  

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया
behatareen.

शेरघाटी January 24, 2010 at 11:05 PM  

mukammal gazal!!!!

har she'r kamaal!!
bemisaal!!
ise yaqinan samajhiye!

shahroz

डॉ. मनोज मिश्र January 24, 2010 at 11:34 PM  

वाह.....

अमित January 24, 2010 at 11:54 PM  

श्रद्धा जी,
वो मेरी मेज पे अपनी किताब छोड़ गया
लाजवाब मिसरा!
मक्ता बहुत ही दमदार है
सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

Yogesh January 25, 2010 at 12:51 AM  

Vaah Vaah !!!!

kishor kumar khorendra January 25, 2010 at 1:27 AM  

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

aaj nahii ..nahii ..me bhi
padh gayaa

aapki gajal ..jinaa sikhatii hai

kyaa baat hai ..

hamare ko chhu leti hai

tum bhi kis dunia se aayii ho ...

bahut sundar ...

har she"r ..sundar ..

badhaaiiyaa

kishor

विनोद कुमार पांडेय January 25, 2010 at 1:42 AM  

सुंदर ग़ज़ल..बधाई!!

आशु January 25, 2010 at 3:02 AM  

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

बहुत सुन्दर मतला...हर शयेर बहुत उम्दा और अच्छे वजन का था..

बधाई

आशु

अपूर्व January 25, 2010 at 4:13 AM  

पूरी गज़ल ही बहुत खूबसूरत और हर शे’र पुरकशिश है..किताब छोडने वाली बात भी पहली बार कहीं पढ़ी..और इस शे’र की सकारात्मकता

सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया

'अदा' January 25, 2010 at 4:16 AM  

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया

poori ghazal behtareen hai..aur is sher ne khaas taur par dil churaaya hai..
shukriya..

मानसी January 25, 2010 at 8:58 AM  

क्या बात है श्रद्धा। वाह!

Udan Tashtari January 25, 2010 at 9:30 AM  

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया..


-बहुत शानदार रचना..हर शेर लाजबाब!!

श्याम कोरी 'उदय' January 25, 2010 at 10:07 AM  

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
.... बेहतरीन गजल !!!!!

खुशदीप सहगल January 25, 2010 at 10:21 AM  

मैं सांसों के हर तार में छुप रहा हूं,
मैं धड़कन के हर राग में बस रहा हूं,
ज़रा दिल की जानिब निगाहें झुकाओ,

आवाज़ दे के हमें तुम बुलाओ,
मुहब्बत में इतना न हमको सताओ...

जय हिंद...

अनूप भार्गव January 25, 2010 at 10:26 AM  

एक पूरी तरह से मुकम्मल गज़ल । मतले से मकते तक ...

manu January 25, 2010 at 10:30 AM  

WAAAAAH............!!!!!!!!!

manu January 25, 2010 at 10:35 AM  

मुसलसल ग़ज़ल ही कहेंगे इसे..
मतला बड़े कमाल का है.....


नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
लाजवाब...

इस्मत ज़ैदी January 25, 2010 at 12:12 PM  

shraddha ji ,
wah ,matle se maqte tak kya kuchh likh gayi hain ap lekin khas taur par
nazar mili............
sahar ke doobte .............
behad khoobsoorat ashaar
mubarak ho

रंजना [रंजू भाटिया] January 25, 2010 at 3:29 PM  

सब शेर लाजवाब लगे ..खूबसूरत गजल शुक्रिया

वन्दना January 25, 2010 at 4:21 PM  

bahut hi sundar gazal.

डॉ .अनुराग January 25, 2010 at 4:43 PM  

ajeeb shakhs tha .jaate jaate bheed me tanhaiya de gaya.......

kabhi aisa hi liha tha .......

gazal se aapki mohabbat yun hi barkarar rahe.....

निर्मला कपिला January 25, 2010 at 10:36 PM  

ब मेरे कहने को क्या कुछ रह गया है ? कहूँ भी क्या लाजवाब? शायद कम है बाकी औरों का जोड लो । शुभकामनायें

MUFLIS January 26, 2010 at 12:30 AM  

"ये क्या तिलिस्म है,
कैसा सराब छोड़ गया ...."

बहुत ही दिल-फरेब मिसरा है....
अपनी बात ख़ुद बयान करता है.....

ग़ज़ल के सारे शेर मुह्तासिर करते हैं
लबो-लहजा भी कारगर है.....
बार बार पढने को दिल करता है
और....
कही गयी हर बात अपनी-सी महसूस होती है
मुबारकबाद .

"पढूं उसे कि कोई बात मैं करूँ ख़ुद से
मेरे लिए वो अजब इन्तिखाब छोड़ गया"

PRAN SHARMA January 26, 2010 at 5:01 AM  

SHAYRA SHRDDHA JAIN KAA SHER KAHNE
KAA AAPNA KHOOBSOORAT ANDAZ HAI.
UNKEE IS GAZAL KE PAANCHON ASHAAR
MEIN MISHREE KEE MITHAAS HAI.

शमीम January 26, 2010 at 4:03 PM  

सर्वप्रथम आपका आभार।
शेर बहुत अच्‍छे लगे । धन्‍यवाद ।

सुशीला पुरी January 26, 2010 at 9:46 PM  

वाह क्या बात है श्रधा जी .........

वन्दना अवस्थी दुबे January 27, 2010 at 1:39 AM  

वाह वाह!! डूब जाती हूं पढते-पढते...कितना सुन्दर लिखती हैं आप!
अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया
कुछ इस तरह कि -
अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो
इसी सहजता से आप भी शेर अहतीं हैं. बधाई.
गणतंत्र दिवस मुबारक हो.

दिनेश शर्मा January 28, 2010 at 12:22 AM  

सुन्दर रचना के लिए साधुवाद।

गौतम राजरिशी January 28, 2010 at 3:20 AM  

"उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया"

अरे..वाह! वाह!!...गुफ़्तगु के लिये माहताब छोड़ गया...उफ़्फ़्फ़...क्या बात है मैम। सुभानल्लाह!

पूरी ग़ज़ल ही लाजवब बन पड़ी है।

अंकित "सफ़र" January 28, 2010 at 7:03 PM  

हर शेर एक जादू सा कर रहा है...........
खासकर मतला और ".....वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया".
बहुत उम्दा ग़ज़ल है

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) January 30, 2010 at 3:13 PM  

bhuबहुत बेहतरीन श्रधा जी बहुत ही सुन्दर गजल
सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

रचना दीक्षित February 1, 2010 at 3:31 PM  

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया
आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आयी और देर से आने का अहसास हुआ

कुश February 1, 2010 at 7:49 PM  

इसे कहते है ग़ज़ल.. खैर मैं क्या कहू.. ऊपर इतने लोग पहले ही कितना कुछ कह चुके है..

psingh February 3, 2010 at 8:08 PM  

बेहतरीन गजल का जोरदार शेर .
नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
बहुत बहुत बधाई ..............

रोहित ~~ज़िन्दगी की किताब से February 3, 2010 at 10:43 PM  

बेहद खूबसुरत ग़ज़ल ...........

सुलभ § सतरंगी February 5, 2010 at 5:06 PM  

आज ऐसा लगा जैसे कोई चुपचाप कत्ल करके चला गया.

अब हम क्या कहें, ऐसे शे'रे-एहसास पर.

GILLU S February 6, 2010 at 3:15 PM  

WAH WAH...... EKDAM JHAKAAS , HAR LINE ME MUUUHA MUUUUHA....

Akhil February 6, 2010 at 4:49 PM  

shraddha ji,
matle se lekar maqte tak...poori gazal bemisaal hai..har sher apne aap men ek kahani bayan karta hai...daad kabool karen..
shukriya..

त्रिपुरारि कुमार शर्मा February 7, 2010 at 1:55 AM  

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया

...बस यही सिलसिला तो है जो हमें साँस लेने पर मज़बूर कर देती है |

बहुत बहुत शुक्रिया !

सर्वत एम० February 8, 2010 at 6:55 PM  

मैं देर से दुरुस्त आया. अब तो यही कहता फिर रहा हूँ कि किसी को भी नहीं टोकूंगा. आप को एक बार गलती से टोका था. और आप तो ऐसी ऐसी गजलें कहने लगीं कि मेरी हिम्मत ही छूट गयी. एक जंगल में २ शेर नहीं रह सकते, लिहाज़ा श्रद्धापूर्वक निवेदन कर रहा हूँ कि गजलों का यह पूरा जंगल आपको मुबारक.
इतना अच्छा लिख लिख कर मार दी न लात गरीब के पेट पर!

$hy@m-શૂન્યમનસ્ક February 10, 2010 at 12:56 PM  

एक से एक बेहतरीन शेर
लाजवाब ......
धन्यवाद
आपकी गझलें वाकेइ बहोत उमदा कक्षा की एवं लाजवाब होती है
-श्याम शून्यमनस्क
http://shyam-shunyamanask.blogspot.com/2009/08/blog-post_9522.html

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह February 18, 2010 at 1:38 AM  

बहुत उम्दा ,मन को छूती हुई ,असरदार ग़ज़ल ,किन शब्दों में आपकी प्रशंशा की जाये .
इसी तरह लिखती रहें रूह को सुकून मिलता है /
सादर,
डॉ.भूपेन्द्र
जीवन सन्दर्भ .ब्लागस्पाट .कॉम

mahen March 9, 2010 at 7:23 PM  

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया

mahen March 9, 2010 at 7:25 PM  

aap achhi ghazal kahne lagi hain..
zore qalam aur ziyada...

regards
mahen..

पंकज "सानिध्य " March 14, 2010 at 4:53 AM  

aapki lagbhag saari rachna padhi,videsh me rahkar ye bhasha prem kabile-tarif h apne vichar baatne k liye shukriya 'samay mile to meri poems padhna swagat h aapki tippani ka

Yatish March 20, 2010 at 3:16 PM  

कुछ ऐसे ही होते है ज़िन्दगी के पड़ाव
वक्त पल पल पर श्रद्धा के राज छोड़ गया

Pranav Pradeep Saxena March 26, 2010 at 7:39 PM  

बहुत मिलेंगे ख्वाब जगाने वाले

मिला कर के नज़रें झुकाने वाले

अपनी मीठी बातों में फंसाने वाले

सवालों में अक्सर उलझाने वाले

चले जायेंगे यूँ ही रुलाकर वो तुमको

कहने को अपना बनाकर वो तुमको

प्रतीक्षा में अपनी बैठाकर वो तुमको

मजबूरी का बहाना बताकर वो तुमको

मगर न भटकना कभी भी तू राहें

नहीं नीची करना तू अपनी निगाहें

रोके कभी भी जो दुश्मन ज़माना

और बुलंद करना तू अपनी सदाएं

Kamlesh Kumar Diwan March 31, 2010 at 2:24 AM  

mej par kitaab chord gaya ,gajal me achchi upmaye hai .badhai

Mukesh Kumar Sinha April 2, 2010 at 5:14 PM  

ajeeb sakhs hai wo...........bahut khub!! kabhi hamare blog pe bhi tasreef layen..:)

http://jindagikeerahen.blogspot.com

Shayar Ashok April 14, 2010 at 12:56 PM  

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

माशाल्लाह ......!!...क्या मतला है

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया

लाजवाब शेर ......बहुत उम्दा !!

khudakhairkare.blogspot.com June 17, 2010 at 10:24 AM  

tahnks and badhai for a ghazal which is very soft and heart touching.

Anonymous March 25, 2011 at 6:07 PM  

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया

wah shardha ji kya kahne :)

www.blogvani.com

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