Tuesday, August 18, 2009

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना

शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

दिलवर हैं आ बैठे पल भर को पास मेरे
इक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना

गैरों के घर रोशन करने की है आदत
चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

आगाज़ ग़ज़ल का कर ही दो अब “श्रद्धा” तुम
उलझा-उलझा मुझको दिखता है आईना

58 comments:

श्यामल सुमन August 18, 2009 at 9:32 PM  

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

बहुत खूब श्रद्धा जी। कमाल की लिखतीं हैं आप। सच तो यह है कि आपकी गजलों का मुझे इन्तजार रहता है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र August 18, 2009 at 9:36 PM  

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति . आभार

रूपम August 18, 2009 at 9:37 PM  

bada samjdar bhi hai aaina
jaise ke liye taisa dikta hai aaina.
bahut accha likha hai aapne

दिगम्बर नासवा August 18, 2009 at 9:38 PM  

Lajavaab hai aapki gazal ......... aaina to kamaal hai gazalkaaron ke liye ....

विनोद कुमार पांडेय August 18, 2009 at 9:55 PM  

शायद कोई उम्मीद जगी है सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

Pyar ki Behtareen Abhivyakti..
Badhayi..

संजीव गौतम August 18, 2009 at 10:18 PM  

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना
मतला बहुत अच्छा हुआ है. बहुत ख़ूब!

mehek August 18, 2009 at 10:18 PM  

दिलवर हैं आ बैठे पल भर को पास मेरे
इक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना

गैरों के घर रोशन करने की है आदत
चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना
waah lajawab,aaine ka har pehlu bayan ho gaya.sunder.

ओम आर्य August 18, 2009 at 10:38 PM  

bahut hi khubsoorat hai ainaa our aapki daastan......

सुरेन्द्र "मुल्हिद" August 18, 2009 at 11:14 PM  

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

bahut sundar abhivyakti....

masoomshayer August 18, 2009 at 11:18 PM  

har sher bas kamal hai bahut khoobsoorat kaha hai

PRAN SHARMA August 18, 2009 at 11:27 PM  

SABHEE SHER DIL SE NIKLE HUE LAGTE
HAIN,YAHEE INKEE KHOOBSOORTEE HAI.
DHERON BADHAAEEYAN.

अर्चना तिवारी August 18, 2009 at 11:38 PM  

वाह क्या खूब ग़ज़ल लिखी है...सुंदर

सुशील कुमार छौक्कर August 18, 2009 at 11:40 PM  

आईना से कई सच्चाई कह दी। पसंद आया ये आईना।
राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना
वाह वाह ...

pragya August 18, 2009 at 11:55 PM  

shradhha ji aap bahut sunder likhatee hain .

Mithilesh dubey August 19, 2009 at 12:01 AM  

अच्छी रचना....बधाई

निपुण पाण्डेय August 19, 2009 at 12:40 AM  

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल है ......
दिल के भाव हर शेर में उमड़ पड़े हैं ...:)

भूतनाथ August 19, 2009 at 1:18 AM  

शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना....
main koi paagal to nahin....
mujhko paagal saa taktaa aayinaa...

गौतम राजरिशी August 19, 2009 at 1:33 AM  

अहा श्रद्धा जी की लेखनी का एक और चमत्कार...

इस शेर पर "राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना" पर तालियां-तालियां...और मतला हटकर जबरदस्त दाद माँग रहा है मुझसे।

राजीव तनेजा August 19, 2009 at 1:42 AM  

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

सुन्दर अभिव्यक्ति

योगेश स्वप्न August 19, 2009 at 9:09 AM  

शायद कोई उम्मीद जगी है सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

bahut khoob, lajawaab rachna.

अमित August 19, 2009 at 11:02 AM  

Bahut kuchh kaha ja chuka hai atah un sab se sahamat hote huye itna hi kahunga ki achchhi lagi ye gazal.

hema August 19, 2009 at 12:46 PM  

aap ki kavita bahut achi lagi. aap ka likha har sabda dil ki gahraiyo ko chu jata hai.

रंजना [रंजू भाटिया] August 19, 2009 at 1:04 PM  

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

वाह बहुत सुन्दर ..बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ..बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति

अनिल कान्त : August 19, 2009 at 1:34 PM  

मुझे बहुत पसंद आई आपकी ये ग़ज़ल

PrakashYadav August 19, 2009 at 2:59 PM  

"राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना"

Waah! Shradhha Ji, lagta hai ek nayee 'MADHUSHAALAA' Likh rahi hain aap.....

Bahut Khoob

pallavi trivedi August 19, 2009 at 3:29 PM  

शायद कोई उम्मीद जगी है सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

just beautiful....

नीरज गोस्वामी August 19, 2009 at 4:03 PM  

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना
वाह श्रद्धा जी वाह...बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने...बधाई..
नीरज

ALOK KHARE August 19, 2009 at 8:34 PM  

shaandar hai

sharsdha ji ye aapka andaaz

दर्पण साह "दर्शन" August 19, 2009 at 11:10 PM  

aapka scrap dekha aaj orkut main...

...dhanyvaad poochne ke liye main accha hoon.
Aap kaisi hain?


ghazal badiya ban padi hai khaskar
शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना....

ye line acchi lagi kya azeeb itfaq hai ki maine bhi aaine ke vishay main likha hai kuch apni recent post main///

रोक ले पलकों में आंसू, ये नदी अच्छी नहीं,
जो हंसा कर फिर रुला दे , वो ख़ुशी अच्छी नहीं।

बाल हैं बिखरे हुए चेहरा शिकन आलूद है
आईने मुझसे तेरी यूँ बेरुखी अच्छी नहीं।

pukhraaj August 20, 2009 at 12:49 AM  

मुझ सा ही दीवाना लगता है आइना
पल में रोता पल में हँसता है आइना

बहुत ही सुन्दर बात कह दी श्रधा

डॉ .अनुराग August 20, 2009 at 3:31 PM  

वाकई उलझा हुआ है मोहतरमा....अरसे बाद नजर आई...कहाँ थी आप ?

अर्शिया August 20, 2009 at 5:01 PM  

बहुत सुंदर गजल।
( Treasurer-S. T. )

"अर्श" August 20, 2009 at 9:43 PM  

देरी के लिए मुआफी जी ... मगर इसमें कोई शक नहीं के मैं आपके ग़ज़लों का दीवाना हूँ ... कोई शक नहीं ... क्या खूब कहती हैं आप... उफ्फ्फ्फ़ हद से बाहर होती है आपकी गज़लें की कुछ कह पौन... बहुत बहुत बधाई..

हर शे'र अलग से दाद मांग रहा है .. फिर आता हूँ ..
अर्श

मानसी August 21, 2009 at 9:17 PM  

श्रद्धा, आपके ब्लाग पर भारत यात्रा से लौट कर अभी ही आने का मौक़ा मिला। देखा तो ४ नई गज़लें कहीं हैं आपने। और हर एक बहुत अच्छी। ग़ज़ल ऐसी हो जो मत्ला पढ़ कर और आगे पढ़ने को जी चाहे, और फिर हर शेर पढ़ते ही चले जायें, जो बात कि आपकी ग़ज़लों में रही। आगे आपकी और ग़ज़लों के इंतज़ार में-

मानोशी

योगेन्द्र मौदगिल August 22, 2009 at 10:10 AM  

कईं दिनों से निरन्तरता नहीं थी इसीलिये चूक गया. सभी ग़ज़लें बेहतरीन हैं श्रद्धा जी... और हां याद आया कि आपने पूछा था दूसरी प्रति का क्या करूं तो उसे किसी पुस्तकालय या किसी काव्यप्रेमी को दे दें. भारतीय डाक-व्यवस्था पर मेरा विश्वास फिर से जम गया. शुक्रिया....

गर्दूं-गाफिल August 22, 2009 at 6:32 PM  

शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

श्रद्धा जी
आप बहुत अच्छा लिख रहीं हैं
पर एक आग्रह आपसे है
जुबाने तो मादरे वतन की सर आँखों पर हैं हमारी
पर मात्र भाषा की भी महिमा है बड़ी प्यारी
फिर आप तो हिन्दी की आध्यापिका भी हैं
कोई गीत कुछ दोहे भी कलम से उतरें यही प्रार्थना हमारी

अंकित "सफ़र" August 23, 2009 at 3:22 PM  

नमस्कार श्रद्धा जी,
वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है....कुछ शेर जैसे "शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना " और "राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना" बेहतरीन बन पड़े हैं.

ilesh August 24, 2009 at 8:07 PM  

behatarin...its realy realy a gr8 one...

विपिन बिहारी गोयल August 27, 2009 at 2:21 AM  

बहुत सुंदर कविता है

Sonu August 27, 2009 at 2:02 PM  

Its a awesome poem !!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी August 27, 2009 at 6:55 PM  

"मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना
राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना"
सुन्दर रचना....बहुत बहुत बधाई....

MUFLIS August 27, 2009 at 10:41 PM  

शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

एक बहुत अच्छी ग़ज़ल कहने पर
बधाई स्वीकार करें
हर शेर अपनी दास्ताँ खुद कह रहा है
.....और ये मिस्रा तो
बिलकुल नया और नायाब है
"इक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना..."
वाह...!

---मुफलिस---

Harkirat Haqeer August 28, 2009 at 12:13 AM  

आगाज़ ग़ज़ल का कर ही दो अब “श्रद्धा” तुम
उलझा-उलझा मुझको दिखता है आईना

बहुत खूब ....!!

लाजवाब लिखतीं हैं आप भी .....!!

Harkirat Haqeer August 28, 2009 at 12:13 AM  
This comment has been removed by the author.
महावीर August 29, 2009 at 1:49 AM  

एक खूबसूरत ग़ज़ल है.
राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

आगाज़ ग़ज़ल का कर ही दो अब “श्रद्धा” तुम
उलझा-उलझा मुझको दिखता है आईना
ये आशा'र बहुत पसंद आये.
महावीर
मंथन

Suman August 29, 2009 at 9:28 AM  

nice

Mumukshh Ki Rachanain August 29, 2009 at 2:22 PM  

गैरों के घर रोशन करने की है आदत
चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना

बेहद पसंद आया ग़ज़ल का यह शेर.

बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
www.cmgupta.blogspot.com

*KHUSHI* August 29, 2009 at 9:05 PM  

wah shraddha.... Aaine ko bekhubi pesh kiya tumne..

संत शर्मा August 29, 2009 at 10:15 PM  

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

lajabab likha hai aapne. Bahut sundar aur sahi bhi.

$hy@m-શૂન્યમનસ્ક August 29, 2009 at 11:38 PM  

वाह वाह वाह
बेहद सुंदर रचना
लाजवाब.....

harish August 31, 2009 at 7:40 PM  

गैर के घर रोशन करने की है आदत
एक दुल्हन जैसा सजता है अब आइना

आईने में उतार दिया आपने तो सब कुछ ...अति सुन्दर

RAJESHWAR VASHISTHA August 31, 2009 at 10:45 PM  

अच्छी ग़ज़ल कहना आसान नहीं होता.......मगर आपके लिए है..बधाई..

Babli September 2, 2009 at 10:07 PM  

hi diiii...........badi pyari gazal likhi hai.....congrats!

Babli September 2, 2009 at 10:10 PM  

hi diiii...........badi pyari gazal likhi hai.....congrats!

शरद कोकास September 3, 2009 at 1:20 PM  

मै सोच रहा हूँ आपने अपने ब्लॉग का नाम भीगी गज़ल क्यों रखा ! आपके शहर विदिशा की याद आते ही स्व.शलभ श्रीराम सिंह याद आ गये । वे दुर्ग में कुछ दिन मेरे यहाँ रुके थे और विदिशा के बारे में ढेरों बाते बताया करते थे । गज़ल तो अच्छी है आपकी ।- शरद कोकास

Shailendra January 4, 2010 at 6:39 PM  

आपने जो लिखा है यह नया २०१० में यह ह्रदय को छू जाता है मै ग़ज़ल पसंद करता हु किन्तु खुद नहीं लिख सकता हु क्युकी मेरे में ऐसी काबिलियत नहीं है.

आपका बहुत बहुत आभार
शैलेन्द्र त्रिपाठी

+919274584757

stripathi30625@gmail.com

mukesh masoom January 7, 2010 at 9:03 PM  

आपके शब्दों से सच्चाई की महक टपकती है... वाह ...........

संजय भास्कर January 8, 2010 at 3:18 PM  

aap ki kavita bahut achi lagi. aap ka likha har sabda dil ki gahraiyo ko chu jata hai.

www.blogvani.com

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