Sunday, January 25, 2009

नज़र नहीं आती

घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती

हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

1212/1122/1212/22

59 comments:

राजीव तनेजा January 25, 2009 at 10:17 PM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती

जीवन की सच्चाईयों से रुबरू कराती आपकी गज़ल बहुत अच्छी बन पड़ी है....बधाई स्वीकारें

mehek January 25, 2009 at 10:24 PM  

waah bahut khub lajawaab

अखिलेश शुक्ल January 25, 2009 at 10:25 PM  

श्रद्धा जी आपकी ग़ज़लें पढ़ी। बहुत ही अच्छी रचनाएं हैं ये। आप इन्हें पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए अवश्य ही भेंजे। यदि पत्रिकाओं के पते चाहिए तो मेरे ब्लाग पर अवश्य ही पधारें आपकों पत्रिकाओं की समीक्षा के साथ ही उनमें प्रकाशित रचनाओं का विवरण भी मिल जाएगा।
मैं भी मध्यप्रदेश के एक छोटे शहर इटारसी का रहने वाला हूं। विदेशी धरती से कोई अपना हिंदी के लिए काम कर रहा है यह जानकार खुशी हुई।
विनीत
अखिलेश शुक्ल
संपादक कथा चक्र

अखिलेश शुक्ल January 25, 2009 at 10:26 PM  

my blog url is
http;//katha-chakra.blogspot.com
akhilesh Shukla
editor Katha Chakra

आकांक्षा~Akanksha January 25, 2009 at 10:39 PM  

इस गणतंत्र दिवस पर यह हार्दिक शुभकामना और विश्वास कि आपकी सृजनधर्मिता यूँ ही नित आगे बढती रहे. इस पर्व पर "शब्द शिखर'' पर मेरे आलेख "लोक चेतना में स्वाधीनता की लय'' का अवलोकन करें और यदि पसंद आये तो दो शब्दों की अपेक्षा.....!!!

रश्मि प्रभा January 25, 2009 at 10:41 PM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती
......
jaandaar dhang se asliyat ko rakh diya,bahut hi achha likha hai

अनिल कान्त : January 25, 2009 at 10:45 PM  

श्रद्धा जी लाजवाब .....

अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

योगेन्द्र मौदगिल January 25, 2009 at 11:12 PM  

बेहतरीन........... पर पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि गिरह बहुत अच्छी है... बहरहाल.. अच्छे शेर निकाले.. आप को बधाई..

योगेन्द्र मौदगिल January 25, 2009 at 11:13 PM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती

Pratap January 25, 2009 at 11:15 PM  

इत्तिफाक से आपके ब्लॉग पर आना हुआ...आकर लगा कि वो बहुत खूबसूरत इत्तिफाक था.
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है...समय की गति में कहीं हलकी पड़ती जा रही मानवीय संवेदनाओ की कटिबद्धता और अनिश्चितता का बहुत सुंदर चित्र उकेरा है आपने.

महेन्द्र मिश्र January 25, 2009 at 11:37 PM  

खूबसूरत ग़ज़ल है.
गणतंत्र दिवस पर यह हार्दिक शुभकामना .

मोहन वशिष्‍ठ January 26, 2009 at 12:06 AM  

गणतंत्र दिवस की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं

http://mohanbaghola.blogspot.com/2009/01/blog-post.html

इस लिंक पर पढें गणतंत्र दिवस पर विशेष मेरे मन की बात नामक पोस्‍ट और मेरा उत्‍साहवर्धन करें

नीरज गोस्वामी January 26, 2009 at 12:08 AM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती
कभी सुलझे नहीं माथे की, सलवटें उसकी
कोई तारीख में, पहली नज़र नहीं आती
चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली किसने कहाँ, कुचली नज़र नहीं आती
एक से बढ़ कर एक खूबसूरत और असर दार शेरों से सजी ये ग़ज़ल लाजवाब है...आप में कहने का हुनर बहुत खूब है...लिखती रहें...वाह.
नीरज

Manoshi January 26, 2009 at 12:39 AM  
This comment has been removed by the author.
Manoshi January 26, 2009 at 12:40 AM  

सुंदर है हर शेर श्रद्धा। मगर शायद बहर को थोड़ा सा और बाँधने की ज़रूरत है।

गौतम राजरिशी January 26, 2009 at 12:56 AM  

इम्तहां होने वाले थी इंतजार की मैम...

दिनों बाद आयी आपकी ये गज़ल और आखिरी शेर ने "पहाड़ों से गिरा झरना, तो बोली ये ज़मीं/ये दिल की पीर थी, पिघली नज़र नहीं आती" मन मोह लिया...
बहुत सुंदर...

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" January 26, 2009 at 12:56 AM  

श्रद्धाजी
ग़ज़ल सुंदर,
भाव अच्छे,
और
शेर भी भाव प्रधान.
अच्छा शेर-
कभी सुलझे नहीं माथे की, सलवटें उसकी
कोई तारीख में, पहली नज़र नहीं आती
- विजय

संगीता पुरी January 26, 2009 at 1:54 AM  

बहुत अच्‍छा लिखा है.........गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

दिगम्बर नासवा January 26, 2009 at 3:06 AM  

ये कैसा शोर हवाओं में आज़ दिखता है
कहीं पे गिर गयी, बिजली नज़र नहीं आती

बहुत खूबसूरत बन आयी है यह रचना, हर लफ्ज़ कुछ दास्ताँ बयान करता है, हर शेर लाजवाब है
बधाई है आपको

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन January 26, 2009 at 11:27 AM  

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली किसने कहाँ, कुचली नज़र नहीं आती
श्रद्धा जी, वाह! आपको, आपके परिवार एवं मित्रों को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई! वंदे मातरम!

Udan Tashtari January 26, 2009 at 1:09 PM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती

-हर शेर उम्दा!! दाद कबूलें जी!


आपको एवं आपके परिवार को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

प्रकाश बादल January 26, 2009 at 1:53 PM  

अच्छी ग़ज़ल अच्छा लिख रही हैँ श्रद्धा जी। गणतंत्र दिवस की हार्दिन शुभकामनाएं

सुशील कुमार छौक्कर January 26, 2009 at 2:32 PM  

हर एक शेर सुन्दर हैं। लाजवाब।
हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती

सच के करीब।

डॉ .अनुराग January 26, 2009 at 3:12 PM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती

कभी सुलझे नहीं माथे की, सलवटें उसकी
कोई तारीख में, पहली नज़र नहीं आती

बहुत खूब....अरसे बाद आना हुआ .

dwij January 26, 2009 at 3:15 PM  

बहुत सुन्दर ग़ज़ल
है.

बधाई.

Manish Kumar January 26, 2009 at 5:38 PM  

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली किसने कहाँ, कुचली नज़र नहीं आती

जबरदस्त शेर !

विवेक सिंह January 26, 2009 at 7:48 PM  

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए ............

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) January 26, 2009 at 8:25 PM  

ग़ज़लें तो अच्छी हैं.....मन को भा गई हैं........अब मेरे मन को अपनी गज़लों से बाहर निकालें.......प्लीज़.....!!

ऋचा January 26, 2009 at 9:52 PM  

बेहतरीन गजल कही है। बधाई।

Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.) January 27, 2009 at 6:05 PM  

बहुत खूबसूरत गजल।

ज़ाकिर हुसैन January 29, 2009 at 2:58 PM  

हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों
कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती
लाजवाब .....

Dilip Gour January 29, 2009 at 7:50 PM  

श्रीमती श्रद्धा जी,
बहुत अच्छा लगा कि विदेश में रहते हुए भी आपने देश प्रेम और हिन्दी प्रेम को यथावत सहेज कर रखा,
इसी तरह प्रेम बनाये रखे एवं अपनी माटी से जुड़े संवादों को शब्दों के जरिये ब्लॉग में बयां करते रहें और हमें इसका रसस्वादन करवाते रहें! इसी कामना के साथ...
सस्नेह !
दिलीप गौड़
गांधीधाम

Yogesh January 30, 2009 at 12:10 AM  

Shraddha ji.

aapne meri tareef ki, is liye shukriya, but mera likha aapke likhe ke saamne kuchh bhi nahin hai...

aap to bahut bahut achha likhte ho..main to sirf ek hi topic par likh pata hu..

Main soch hi raha tha ke differnt topics par likhna kaise seekhoon....ab mujhe lagta hai meri talash khatam ho gayii, aapki gazals padh kar seekhoonga...

Bahut hi badhia...

Manoshi January 30, 2009 at 7:59 AM  

वाह श्रद्धा! अब बहुत सुंदर हो गई है ये ग़ज़ल।

makrand January 30, 2009 at 2:54 PM  

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती
bahut khub

ishq sultanpuri January 31, 2009 at 12:07 AM  

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती


bahut hi shandar gazal ye do sher khash hain.......kaee sal bad ek shandar gazal padhi hai.....
.....aap ko tahe dil se badhaee

Vijay Kumar Sappatti January 31, 2009 at 3:10 PM  

shradha ji

kitna behtar likha hai . ye lines ultimate hai .

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

aap yun hi likhe , behtar likhe , aur likhe .. hamne aapki nazmon ka intjaar rahenga ..

meri nai post dekhiyenga

dhanywad..
aapka dost
vijay

'Yuva' February 1, 2009 at 10:39 PM  

युवा शक्ति को समर्पित ब्लॉग http://yuva-jagat.blogspot.com/ पर आयें और देखें कि BHU में गुरुओं के चरण छूने पर क्यों प्रतिबन्ध लगा दिया गया है...आपकी इस बारे में क्या राय है ??

Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.) February 2, 2009 at 7:10 PM  

बहुत ही प्‍यारी गजल कही है आपने, बधाई। यह शेर तो बहुत ही प्‍यारा है

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

विनय February 3, 2009 at 12:40 AM  

ज़रूर पढ़ें: हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख

विनय February 3, 2009 at 12:40 AM  

ज़रूर पढ़ें: हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख

महावीर February 3, 2009 at 9:18 AM  

बहुत ख़ूब श्रद्धा जी। बहर मुजतस मुसम्मन मख़बून मक़सूर लेकर ग़ज़ल लिखना आसान नहीं। दाद क़ुबूल कीजिए।
कुछ शायर आख़िर के २२ को ११२ (फ़ इ लुन) भी लिखते हैं लेकिन फ़र्क़ नहीं पड़ता।
अच्छा लिखती हो।

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) February 3, 2009 at 4:17 PM  

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने। बधाई स्वीकार करें।

seema gupta February 3, 2009 at 5:23 PM  

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती
" what a touching expressions....specially these lines...liked it"

Regards

Harsh pandey February 3, 2009 at 7:05 PM  

yah post gagar me sagar

saraswatlok February 4, 2009 at 8:37 PM  

बहुत अच्छी रचना है।

sandhyagupta February 5, 2009 at 2:40 PM  

Man ko chu gayi aapki rachna.

MUFLIS February 6, 2009 at 11:15 PM  

एक बहोत ही खूबसूरत और म्यारी ग़ज़ल
कहने पर मुबारकबाद कुबूल कीजिये ...
'''हैं चारों और नुमाईश के दौर जो यारो....
बहोत लाजवाब शेर है...सीधा दिल में उतरने वाला...

फिर से मुबारकबाद के साथ . . .

"कई सवाल दिलो-ज़हन को सताते हैं ,
मिरी हयात भी संभली नज़र नहीं आती..."

---मुफलिस---

Rashmi Singh February 8, 2009 at 8:39 PM  

सुन्दर प्रयास...सक्रियता बनाये रखें !!

Dev February 12, 2009 at 10:20 PM  

Nice poem... really superb..
पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती
Badhi

Zahid February 14, 2009 at 2:03 AM  

Bahot khoobsurat rachna...

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

Ghustakhi muaaf, hame pata hai aap hamari har ghustakhi muaaf kar deti hain, arse baad waqt mila...kuch sochne ko...shukriya dost.

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" February 14, 2009 at 2:19 AM  

kisi ek sher ko naheen pooree gazal ko sarahataa hoon

ilesh February 16, 2009 at 4:49 PM  

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

bilkul sahi...
चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

behad umda ..........

cg4bhadas.com February 26, 2009 at 4:42 PM  

छत्‍तीसगढ के विचार मंच में आपक स्‍वागत, है अगर आपके कोई भी खबर या जानकारी है जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध छत्तीसगढ से है तो बस कह दीजिये हमें इंतजार है आपके सूचना या समाचारों का घन्यवाद

cg4bhadas.com February 26, 2009 at 4:47 PM  

छत्‍तीसगढ के विचार मंच में आपक स्‍वागत, है आपके पास कोई खबर या जानकारी है जिसका प्रत्यकक्ष या अप्रत्यकक्ष सम्बन्ध छत्तीसगढ से है तो बस कह दीजिये हमें इंतजार है आपके सूचना या समाचारों का घन्यवाद .....

प्रकाश बादल March 20, 2009 at 1:42 AM  

वाह श्राद्धा जी एक बार फिर और अधिक निखरी हुई गज़लें पढ़ने को मिली।

Nitin Anand April 23, 2009 at 3:53 PM  

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

Wah..!! kya baat he !! bahot khub

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी May 1, 2009 at 9:16 PM  

रचना बहुत अच्छी लगी।
आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।आप मेरे ब्लाग
पर आएं,आप को यकीनन अच्छा लगेगा।

श्याम सखा 'श्याम' July 29, 2009 at 11:43 PM  

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

क्या बात है ,बहुत खूब
श्याम सखा श्याम

www.blogvani.com

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