Wednesday, September 10, 2008

मैने पहने है कपड़े धुले

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमी का बता दीजिए

Beher-e-Mutadaarik:
faa-i-lun; faa-i-lun; faa-i-lun; faa-i-lun
or
L-S-L; L-S-L; L-S-L; L-S-L


Aap bhi ab mire gham badha dijiye
Mujhko lambi umar ki dua dijiye

Maine pahne hai kapdhe dhule aaj phir
Tohmate ab nayi kuch laga dijiye

Roshni ke liye, in andheron mein ab
Kuch nahi to mira dil jala dijiye

Chaap kadmon ki apni main pahchaan loon
Aaine se un mujhko mila dijiye

Gar muhabbat zamane mein hai ik khata
Aap mujhko bhi koi saza dijiye

Chand mere dukhon ko na samjhe kabhi
Chandni aaj uski bujha dijiye

Hanste hanste jo ik pal mein gumsum hui
Raz “Shrddha” nami ka bata dijiye

76 comments:

Shastri September 10, 2008 at 8:46 PM  

"चाँद समझेगा न मेरे दुख को कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए "

मर्मस्पर्शी !!!



-- शास्त्री जे सी फिलिप

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गरिमा September 10, 2008 at 8:53 PM  

as usual दी आप कमाल कि लिखती हैं, और इसे भी कमाल का लिखा है... lovely

Shiv Kumar Mishra September 10, 2008 at 8:56 PM  

बहुत सुंदर गजल.

नीरज गोस्वामी September 10, 2008 at 9:02 PM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए
क्या बात है श्रधा जी....बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...हर शेर लाजवाब...बेमिसाल...बधाई.
नीरज

दिनेशराय द्विवेदी September 10, 2008 at 9:03 PM  

अच्छी ग़ज़ल।

मोहन वशिष्‍ठ September 10, 2008 at 9:15 PM  

है मुहब्बत गुनाह, गर ज़माने में फिर
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद समझेगा न मेरे दुख को कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

bahut hi sundar bhav

neeshoo September 10, 2008 at 9:17 PM  

बहुत अच्छा लिखा आपने श्रद्धा जी। कुछ लाइनें तो दिल को छू गयी। बधाई और इंतजार अगले पोस्ट का।

जितेन्द़ भगत September 10, 2008 at 9:20 PM  

अच्‍छी बात-
आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए
क्‍या खूबसूरती से मोहब्‍बत का इकरार कि‍या गया है-
है मुहब्बत गुनाह, गर ज़माने में फिर
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

अच्‍छी गजल है। एक वि‍नम्र सुझाव है- नाम बदलकर या उपनाम से कई शायर लि‍खते रहें हैं। गृजल में इससे अच्‍छा असर देखने को मि‍ला है। श्रद्धा नाम संस्‍कृत का है इसलि‍ए लय में कुछ ठहराव सा पैदा करता है। आपने नाम/उपनाम के बारे में कभी तो जरुर सोचा होगा।

डॉ .अनुराग September 10, 2008 at 9:38 PM  

चाप कदमों की अपनी, मैं पहचान लूं
आईने से कुछ ऐसे मिला दीजिए


बहुत दिनों बाद नजर आयी ....ये शेर याद रहेगा कई दिनों तक....

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा September 10, 2008 at 9:55 PM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए
kamal ka sher hai.badhiya bhavavyakti.

सागर नाहर September 10, 2008 at 9:56 PM  

एक से एक लाज़वाब अशआर... पर ये लाइने बड़ी शानदार रहीं।
मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए
रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

मजा आ गया।

ranjan September 10, 2008 at 10:13 PM  

चाँद समझेगा न मेरे दुख को कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

क्या बात है..

Manish Kumar September 10, 2008 at 10:47 PM  

Behtareen ghazal likhi hai aapne. har sher lajawab hai

MANVINDER BHIMBER September 10, 2008 at 11:09 PM  

ये केवल कुछ पंक्तियाँ ही नही हैं.....इसमे सुंदर भाव भी दिख रहे हैं ......बहुत सुंदर

श्रीकांत पाराशर September 11, 2008 at 12:55 AM  

Chand samjheg na mere dukh ko kabhi,chandni aaj uski bujha deejiye. Shradhaji, bahut khoob. achhi rachna.

सुशील कुमार छौक्कर September 11, 2008 at 1:13 AM  

बहुत गहरी बातें कहती गजल।
मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए
वाह।

GOPAL K.. MAI SHAYAR TO NAHI... September 11, 2008 at 1:23 AM  

Maine pahne hai kapdhe dhule aaj phir
Tohmate ab nayi kuch laga dijiye

WAH..!! BAHUT HI KHOOBSURAT GAZAL LIKHI HAI AAPNE..!
BADHAAYI

दीपक September 11, 2008 at 2:09 AM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

ये लाइने बहुत अच्छी लगी !!

Udan Tashtari September 11, 2008 at 3:42 AM  

बहुत ही बेहतरीन गज़ल-वाह!!

-----------


आपके आत्मिक स्नेह और सतत हौसला अफजाई से लिए बहुत आभार.

शहरोज़ September 11, 2008 at 4:03 AM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

बेहद खूबसूरत
...हर शेर लाजवाब...
बेमिसाल...
ustaad shaayar bhi ghutne tek gaye.

सतीश सक्सेना September 11, 2008 at 11:14 AM  

"हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमी का बता दीजिए"

गुनगुनाने का मन हो रहा है, इतनी अच्छी ग़ज़ल है यह श्रद्धा जी !

Anil Pusadkar September 11, 2008 at 1:10 PM  

wah,kya baat hai. behatarin gazal

ज़ाकिर हुसैन September 11, 2008 at 2:16 PM  

लम्बे अन्तराल के बाद इतनी खुबसूरत ग़ज़ल के साथ वापसी ने सारे गिले-शिकवे दूर कर दिए.
हर शेर लाजवाब. हर शेर बेमिसाल.

*KHUSHI* September 11, 2008 at 2:27 PM  

hand samjhega na mere dukh ko kabhi
Chandni aaj uski bujha dijiye


bahot badhiya shraddhaji

Sanjeet Tripathi September 11, 2008 at 3:35 PM  

सुंदर

Parul September 11, 2008 at 3:45 PM  

bahut khuub shradhha..

Lovely kumari September 11, 2008 at 4:57 PM  

अच्‍छी गजल.. बहुत सुंदर भाव.

Deepak Bhanre September 11, 2008 at 5:19 PM  

जी मार्मिक और बहुत ही सुंदर .

कुश एक खूबसूरत ख्याल September 11, 2008 at 5:23 PM  

bahut khoob... dhardhar gazhal

pallavi trivedi September 11, 2008 at 7:26 PM  

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी, मैं पहचान लूं
आईने से कुछ ऐसे मिला दीजिए
bahut khoob...

Prakash singh "Arsh" September 12, 2008 at 12:59 AM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

bahot hi kam puri tarah se purn ghazal padhane ko milta hai ,bahot hi umda likha hai aapne ..sundar rachana ke liye badhai.....


regards
Arsh

Ajay September 12, 2008 at 3:08 PM  

Bahut khoob

रौशन September 13, 2008 at 8:22 PM  

एक पुराणी गजल याद आ गई

मेरा दामन बहुत साफ़ है
कोई तोहमत लगा दीजिये

बहुत शानदार!

योगेन्द्र मौदगिल September 14, 2008 at 12:50 AM  

गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए
Wah..Kya baat hai...

ashok priyaranjan September 14, 2008 at 1:30 AM  

aapki gazal main bhav key saath hi technic bhi behtar hai

cartoonist ABHISHEK September 14, 2008 at 10:38 PM  

"तोहमते अब नई कुछ........"
badhai

Purnima September 15, 2008 at 1:19 AM  

main kaha hi tha mam
supreb
bahut accha likha hai
wakai....
all the best
keep it up
thank u .............

Deepak September 15, 2008 at 2:55 AM  

abhi jagjeet singh saaheb ki gazhala sunte hue aapki gazhal padhi. maza aa gya. aapko badhai...

Dr. Nazar Mahmood September 15, 2008 at 7:42 PM  

khubsurat ghazal ki takhliq ke liye mubarakbaad , padhkar accha laga , isi tarahan likhte rahiye

Dr. Nazar Mahmood September 15, 2008 at 7:42 PM  

khubsurat ghazal ki takhliq ke liye mubarakbaad , padhkar accha laga , isi tarahan likhte rahiye

योगेन्द्र मौदगिल September 16, 2008 at 11:45 AM  

श्रद्धा जी,
साहित्यशिल्पी पर आपकी टिप्पणी से मैं धन्य हुआ.
मेरी ऊर्जा में आशातीत वृद्धि हुई.
मैं प्रयासरत हूं कि कुछ और ऐसा कह पाऊं जो आप सरीखे समर्थ रचनाकारों को अच्छा लगे.

Zakir Ali 'Rajneesh' September 16, 2008 at 4:39 PM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए ।

बहुत खूबसूरत शेर है, कहने का अंदाज भी सबसे जुदा। ऐसे में बधाई तो बनती ही है।

Nameless... fameless!! September 16, 2008 at 9:29 PM  

too gud mam!! likhti rahiye

संवेदनाऍं September 16, 2008 at 9:35 PM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

बेहतरीन गज़ल के ये शेर बहुत उम्‍दा लगे, बहुत अच्‍छी रचना के लि‍ए बधाई।

Anonymous September 17, 2008 at 1:41 PM  

wah wah

प्रदीप मानोरिया September 18, 2008 at 12:26 PM  

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए
बहुत सटीक लिखा है आपने हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है निरंतरता की चाहत है समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दें

श्यामल सुमन September 19, 2008 at 12:10 AM  

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब।
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए।।

बहुत ही सुन्दर। बधाई। किसी की दो पंक्तियाँ जोडना चाहता हूँ-
अंधेरा माँगने आया था रोशनी की भीख।
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

रश्मि प्रभा September 19, 2008 at 9:46 PM  

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए
.......
bahut hi dili ehsaas hain,bahut sundar

mehek September 19, 2008 at 9:59 PM  

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए
wah bahut hi shandar gazal,har sher subhan allah

परमजीत बाली September 20, 2008 at 4:00 AM  

बहुत बढिया लिखा है।

चाप कदमों की अपनी, मैं पहचान लूं
आईने से कुछ ऐसे मिला दीजिए

vijaymaudgill September 21, 2008 at 10:21 PM  

चाप कदमों की अपनी, मैं पहचान लूं
आईने से कुछ ऐसे मिला दीजिए

क्या बात है! आपकी सोच की दाद देता हूं। क्या ख़ूबसूरत ग़ज़ल है। पहली बार आया हूं। अब बस आता ही रहूंगा।

sachin September 22, 2008 at 7:20 PM  

very nice blog...

http://shayrionline.blogspot.com/

"SURE" September 23, 2008 at 5:11 PM  

है मुहब्बत गुनाह, गर ज़माने में फिर
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद समझेगा न मेरे दुख को कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए .....

शब्द शिल्प पर आपका पुरा अधिकार है
अच्छी गजल पढ़वाने के लिए शुक्रिया
लिखते रहिये ...

कुणाल किशोर (Kunal Kishore) September 24, 2008 at 11:30 AM  

श्रद्धा जी, शायद मै आप का ही नही खुद का गुनह्गार हुँ जो आपके कई इतनी प्यारी रचनावो और गजलो से खुद को वंचित रखा| ब्लोग जगत मे मै उतना सक्रिय नही थी पर धीरे धीरे मै यहाँ आप सब को पढने और आपसब से सीखने का भरसक प्रयास कर रहा हुँ और आपके ब्लोग की ये गजल बस दिल को छु गई|

है मुहब्बत गुनाह, गर ज़माने में फिर
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

शायद हमे तब तो फाँसी ही हो जाये.... :)

ऐसे ही बस लिखते रहे.... बहुत बहुत बधाई...

राकेश खंडेलवाल September 24, 2008 at 8:42 PM  

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

अपनी अस्मिता जानने की खूबसूरत कोशिश

Dr. RAMJI GIRI September 24, 2008 at 9:15 PM  

खूबसूरत रूमानी शिकवा-शिकायत है आपकी रचना में...
पर चांदनी की क्या खता ...नाराज़गी तो ज़माने से है...

Yatish Jain September 25, 2008 at 6:40 PM  

बहुत अच्छा
पर ये एक तरफा बात है, उनके खयालो मे भी आप ज़रूर आते होगे भूले बिसरे

sanju September 26, 2008 at 11:28 PM  

आप तो बहुत ही अच्छा लिखती हैं मैं भी आपके ही पास अशोकनगर का ही हूँ आपली लेखन में जादू है

सरस्वती प्रसाद September 27, 2008 at 12:15 AM  

bahut kuch hai is rachna me,aashirwaad mera

yogesh samdarshi September 27, 2008 at 12:26 AM  

badhai suandar rachna ke liye... dil ko choo jaane waali Gazal hai yeh jitni baar padho gungunao acha lagta hai

Pramod Kumar Kush ''tanha" September 30, 2008 at 2:23 PM  

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

achaanak aapki ghazalo.n se ru-b-ru hone ka mauqa mila.Waah, Kya baat hai...har she'r laajawab..badhaayee...aise hi likhtii rahein..

भवेश झा October 2, 2008 at 1:42 AM  

vah-vah, pahli bar es blog par aaya hun or etani saandar yaden, maja aa gaya, dhnyabad,

अरूणा राय October 2, 2008 at 2:55 AM  

बहुत ही सुंदर
बधाई

BrijmohanShrivastava October 2, 2008 at 6:43 PM  

मुझको लम्बी उम्र की दुआ दीजिये पर निवेदन है की बैसे देखा गया है की बुजुर्ग लोग आशीर्वाद देकर यहीं कहते है की _आयुष्मान भव : दीर्घजीवी हो ,बूढो डोकरा होईयो ,इस पर किसी ने कहा है की मुसीवत और लम्बी जिंदगानी , बुजुर्गों की दुआ ने मार डाला

शाहिद समर October 6, 2008 at 3:44 AM  

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए
bahut sunder kaha hai
shubhkamnayen
shahid samar

शाहिद समर October 6, 2008 at 3:44 AM  

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए
bahut sunder kaha hai
shubhkamnayen
shahid samar

rajveer singh October 30, 2008 at 12:48 PM  

dil ko chune wali gajhal hai aap ki

MUFLIS December 4, 2008 at 7:19 PM  

bahot hi umda aur meaari ghazal kahee hai. Aur ye sher ...
"chaap qadmoN ki apni maiN pehchaan looN , aaeene se yu mujhko milaa dijiye", haasil.e.ghazal sher hai. Mubarakbaad qubool farmaaeiN.
---MUFLIS---

vandana December 18, 2008 at 3:08 PM  

bahut achcha likhti hain aap ..aaj pahli baar aapke blog par aayi hun.......badhayi

dilip200 December 22, 2008 at 4:26 PM  

shrddha ji

ek lambe antaraal ke baad aapki koi gazal padi. wakai main bahut hi dil ko choo jane wali gazal hai'' merii badhaaii

परा वाणी - the ultimate voice February 14, 2009 at 1:09 AM  

रसात्मक और सुंदर अभिव्यक्ति

SWAPN February 14, 2009 at 6:51 PM  

bahut sunder meter men napi tuli rachna.

Sheena February 25, 2009 at 6:48 PM  

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

sach kaha hai aapne..bahut achha likha hai...

s h o o n y a March 6, 2009 at 2:33 PM  

श्रधा जी नमस्कार
आज भीगी गज़ल से मुलाकात हुई, आपका ब्लॉग बहुत पसंद आया.
आपकी ये गजल बहुत बहूत कुछ कह गयी है :
" मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर / तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए"

मेरी शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिये
धन्यवाद

आभार
विपिन

shikha varshney June 18, 2009 at 3:27 AM  

Shradha ji ! aaz bhaut sari gazale padhin aapki....urdu itni pyaari bhasha hai ki seedhe dil main dastak deti hai ..or aapki gazalen un lafzon ko poori tarah compliment karti hain..bahut achcha laga yahan aakar...
sprem
shikha

Akhil July 9, 2009 at 6:08 PM  

"मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए"

bahut sundar ashaar hain shraddha ji...dil ko chu gaye..poori gazal kamyab hai..

www.blogvani.com

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