Saturday, August 30, 2008

वो मुसाफिर किधर गया होगा

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

है, वो हैवान ये माना लेकिन
उसकी जानिब भी डर गया होगा

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

34 comments:

Udan Tashtari August 30, 2008 at 12:58 AM  

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा


-बहुत उम्दा, क्या बात है!

आनन्द आ गया.

VIVEK SINGH August 30, 2008 at 1:06 AM  

मान गये श्रद्धा जी. पर यह गज़ल कुछ सुनी हुई सी लग रही है . माफ करेँ .

मीत August 30, 2008 at 1:14 AM  

Simply speaking Ma'am, I have no words ..... Let me quote even if it means quoting alomst the whole Ghazal :

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

ग़ज़ल कहने की विधा को पूरी तरह निबाहते हुए .... ये ग़ज़ल लाजवाब है. यूं ही लिखा करें .... हर शेर लाजवाब !

श्रीकांत पाराशर August 30, 2008 at 1:34 AM  

dil ko chhoo gayi yah gazal. bahut khoob.

Mrs. Asha Joglekar August 30, 2008 at 1:51 AM  

Bahot Khoob.

रंजन गोरखपुरी August 30, 2008 at 2:07 AM  

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

क्या बात है!! बहुत खूब!!

Anil Pusadkar August 30, 2008 at 2:32 AM  

behtareen, hamesha ki tarah,badhai aapko

सचिन मिश्रा August 30, 2008 at 2:46 AM  

Bahut khub

Advocate Rashmi saurana August 30, 2008 at 3:25 AM  

bhut khub. jari rhe.

GOPAL K.. MAI SHAYAR TO NAHI... August 30, 2008 at 4:19 AM  

WAH, BAHUT ACHHI GAZAL LIKHI AAPNE.. ACHHA LAGA PADH KAR..

*KHUSHI* August 30, 2008 at 1:42 PM  

kya baat hai sharadhaji.... kuch likhne ki gutakhi kar rhai hu....


pani mai jalti mumbatti ko dekh ke
aaj to khuda bhi pigal gaya hoga....

सुशील कुमार छौक्कर August 30, 2008 at 2:02 PM  

बहुत ही उम्दा। और क्या कहें।

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

नीरज गोस्वामी August 30, 2008 at 2:40 PM  

श्रद्धा जी
बेहतरीन ग़ज़ल...ऐसे ही लिखती रहें.
नीरज

Vinay Jain "Adinath" August 30, 2008 at 3:30 PM  

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

Bahut Umda Shraddha jee

अनुराग August 30, 2008 at 3:43 PM  

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

ye sher bahut pasand aaye......subhan allah.....

ज़ाकिर हुसैन August 30, 2008 at 3:54 PM  

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा


-बहुत उम्दा

pallavi trivedi August 30, 2008 at 5:09 PM  

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

waah waah...bahut khoobsurat ghazal hai.

शोभा August 30, 2008 at 6:16 PM  

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

है, वो हैवान ये माना लेकिन
उसकी जानिब भी डर गया होगा

बहुत अच्छा लिखा है। बधाई स्वीकारें।

महेंद्र मिश्रा August 31, 2008 at 12:19 AM  

क्या बात है,अच्छा लिखा है ।

GIRISH BILLORE MUKUL August 31, 2008 at 3:13 AM  

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा
vah

rakhshanda August 31, 2008 at 2:14 PM  

bahut khoob...kya bat hai.

योगेन्द्र मौदगिल August 31, 2008 at 6:47 PM  

शुभकामनाएं..........
अच्छी गजल कही है आपने.....

seema gupta September 2, 2008 at 1:31 PM  

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा
" mind blowing, read first time, really great to read it and know about you"

Regards

उत्पल कान्त मिश्रा "नादां" September 2, 2008 at 4:32 PM  

Acchi Ghazal kahi Dost aapnain ... yeh do sher khas pasand aaye

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

insa allah ..... apki kalam ko nayi rawaaiyaan milti rahain :)

'ताइर' September 2, 2008 at 4:44 PM  

maafi chahunga bade dino ke baad aane ke liye...par abhi online aana kam ho gaya hain...

aapki ghazal achhi lagi...par ye sher sidha hi dil mein utra...

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

महेंद्र मिश्रा September 3, 2008 at 2:55 PM  

"गणपति बब्बा मोरिया अगले बरस फ़िर से आ"
श्री गणेश पर्व की हार्दिक शुभकामनाये .....

महामंत्री-तस्लीम September 3, 2008 at 5:40 PM  

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा।

बहुत प्यारा शेर है, मुबारबाद कुबूल फरमाएँ।

शहरोज़ September 4, 2008 at 6:28 AM  

kya kahna hai.
kiski mati mari gayi hai k kahe , gazal faltu ki vidha hai.
are janag yahan aakar dekho gazal kise kahte hain
ab tagazzul bhi a raha hai dhere-dheere.
bahut khoob
maza aagaya
yun ise maza aana nahin kahna chahiye kyonki dard se sarabor hai har sher.

Manish September 8, 2008 at 6:24 AM  

क्या मस्त लिखा वाह !
ये अपने दोस्तों के बीच ले जाने की तमन्ना है:) :)

संवेदनाऍं September 9, 2008 at 8:36 PM  

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

आपने 'नि‍राला' की वह कवि‍ता जरूर पढ़ी होगी,
'वह तोड़ती पत्‍थर', फि‍र मध्‍यप्रदेश से हैं, तो जरूरी पढ़ी होगी......;;;
उक्‍त पंक्‍ति‍यों में नि‍राला जी के अहसास याद आ गये, उनकी कवि‍ता का मर्म इन पंक्‍ि‍तयों में मि‍लता है। बधाई स्‍वीकार करें....

प्रदीप मानोरिया September 26, 2008 at 12:33 AM  

आप मेरी रचना पढ़कर हर्षित हुयी यह मुझे प्रसन्नता प्रदान करने वाला तथ्य है आपकी रचनाये दिल को छु लेने वाली हिं बहुत दिनों से आपकी नई रचना प्राप्त नहीं हुयी ....... आपको मेरे ब्लॉग पर पधारने हेतु पुन:: आमंत्रण है

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" October 10, 2008 at 1:59 AM  

SACH BEHAD MARMBHEDI HAI

sumit March 23, 2009 at 3:44 PM  

मुझे यकीं हैं इस ग़ज़ल को पढने वाला भी ,लम्हे भर को ठहर गया होगा.
बहुत खूब.

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) July 28, 2009 at 8:22 PM  

srdha ji bhut hi sundar gajal bhavotirokt se bhar gaya ye layne khas kar prvahait karti hai
तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा
mera prnaam swikaar kare
saadar
praveen pathik
9971969084

www.blogvani.com

About This Blog