Monday, July 14, 2008

मालूम न था हमको

आई जो कभी दूरी ,कर देगी जुदा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

रिश्तों की कसौटी पर खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए
अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

मौला ये बता दे मुझे, मेरा दिल क्यूँ सुलगता है
सूरज में जलन है गर, क्यूँ चाँद पिघलता है
साँसों के भी चलने से, लगता है बुरा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

सोचा कि मना लूँ उन्हें, मिन्नत भी कई कर लूँ
कदमों में गिर जाऊं, बाहों में उन्हें भर लूँ
होगा ये नही लेकिन, आसां जो लगा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ गिराना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

27 comments:

विनय प्रजापति 'नज़र' July 14, 2008 at 10:41 PM  

good poem!

नीरज गोस्वामी July 14, 2008 at 10:48 PM  

आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको
श्रधा जी
बहुत मार्मिक रचना लिखी है आप ने...बहुत संवेदन शील....दिल को सीधे छू गयी....
नीरज

महेंद्र मिश्रा July 14, 2008 at 10:53 PM  

मौला ये बता दे मुझे,मेरा दिल क्यूँ सुलगता है
सूरज में जलन है गर,क्यूँ चाँद पिघलता है
साँसों के भी चलने से,लगता है बुरा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको ...

संवेदन शील मार्मिक लिखी है.

अनुराग July 14, 2008 at 10:53 PM  

मौला ये बता दे मुझे, मेरा दिल क्यूँ सुलगता है
सूरज में जलन है गर, क्यूँ चाँद पिघलता है
साँसों के भी चलने से, लगता है बुरा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

bahut khoob ...aapko padhne ka maja bhi khoob hai....

रंजना [रंजू भाटिया] July 14, 2008 at 11:10 PM  

रिश्तों की कसौटी पर खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए
अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

बहुत खूब श्रद्धा जी

परमजीत बाली July 14, 2008 at 11:38 PM  

अति सुन्दर!

रिश्तों की कसौटी पर खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए
अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

Udan Tashtari July 15, 2008 at 12:27 AM  

आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको


--Bahut khoob!!! Badhai.

अबरार अहमद July 15, 2008 at 2:07 AM  

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ गिराना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

सच कहूं तो श्रद्धा जी रोंगटे खडे हो गए मेरे इस गीत को पढकर। वाकई बहुत सिददत से लिखी गई है यह। मैं तहे दिल से आपका शुक्रगुजार हूं कि इतनी अच्छी रचना पढने को मिली। आपको बधाई।

राज भाटिय़ा July 15, 2008 at 4:12 AM  

आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको
बहुत ही मार्मिक कविता लिखी हे आप ने बहुत उदास कर दिया,
आप का धन्यवाद,

राजीव तनेजा July 15, 2008 at 8:06 AM  

दूर हुए हो कुछ यूँ तुम हम से
दिल अपना चाक-चाक रोता है...

जब भी बन्द मुट्ठी खोलते हैँ..

हाथ खाली था..खाली होता है


भीतरी संवेदनाओं को उकेरती हुई मार्मिक कविता.....

अनूप शुक्ल July 15, 2008 at 8:12 AM  

बहुत खूब!

Anil Pusadkar July 15, 2008 at 11:29 AM  

sunder

PREETI BARTHWAL July 15, 2008 at 2:47 PM  

सोचा कि मना लूँ उन्हें, मिन्नत भी कई कर लूँ
कदमों में गिर जाऊं, बाहों में उन्हें भर लूँ
होगा ये नही लेकिन, आसां जो लगा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

अतिसुन्दर।

Mukesh Kumar Sinha July 15, 2008 at 3:13 PM  

bahut marmik aur pyari rachna.......!!

ज़ाकिर हुसैन July 15, 2008 at 3:22 PM  

आई जो कभी दूरी ,कर देगी जुदा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

रिश्तों की कसौटी पर खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए

बुहत खुबसुरत!!!

महामंत्री-तस्लीम July 15, 2008 at 4:42 PM  

Khoobsoorat GHAZAL.

Pranav Pradeep Saxena July 15, 2008 at 6:09 PM  

श्रद्धा जी शायर तीन तरह के होते हैं पहले वो जो कलम से लिखते हैं ये चाहकर भी कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर पाते हैं, दूसरे वो जो दिमाग से लिखते हैं ये शायरों की दुनिया में सबसे ज्यादा नाम कमाते हैं, और तीसरे वो जो दिल से लिखते हैं ये कई बार अपनी रचनाएं दुनिया के सामने भी नहीं लाते हैं.
हम खुशनसीब हैं जो ऐसे ही एक शायर की रचनाएं पढ़ पा रहे हैं.
सच में आपकी ये कविता हमें, ऊंची श्रेणी के कवियों में आपको गिने जाने की वजह याद दिलाती है.

P. C. Rampuria July 15, 2008 at 6:56 PM  

सुंदर ! सुंदर !! अति सुंदर !!!
शब्द नही हैं आपकी तारीफ़ के लिए !
विदिशा या भेलसा की इस बेटी को प्रणाम !
शुभकामनाए

'ताइर' July 15, 2008 at 9:18 PM  

dard bahri nazm...kuchh zakhm taaza kar gayi...

Shiv Kumar Mishra July 15, 2008 at 9:22 PM  

Sundar. Bahut maarmik rachna hai.

vandana August 2, 2008 at 11:32 PM  

nice poem.....!

सतीश सक्सेना August 5, 2008 at 10:49 AM  

बेहद खुबसूरत नज़्म है आपकी !

Akshaya-mann August 12, 2008 at 1:58 AM  

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ गिराना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको
bahut acche se dard ko darshya hai virha se samporn rachna..

ramamathun September 13, 2008 at 2:30 PM  

sardha ji maine ap ka blog dekha waki ap dil se likhti ishwar kare ap esi tarah likhti rahe our hamain achi kavita our kahani padhne ka muka mele

Rani Mishra September 23, 2008 at 5:56 PM  

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ गिराना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको
BAHUT KHUB LIKHA HAI SHRADHA JI,
HAR SHABD KHUD KA YATHARTH CHITRAN KARTA HAI.......OR DARSHATA HAI AAPKI SANVEDNA OR BHAVNAO KO,........
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Yatish Jain September 25, 2008 at 9:14 PM  

कई लोगो के दिल की बडे ही सजीले ढग से कह दी आपने.रिश्ते तो बनते बिछडते रहते है,कही किसी मोड पर कोई और रिश्ता खडा होगा, ज़िन्दगी फिर कुछ कहेगी कुछ अनकही सी

kishor kumar khorendra January 30, 2010 at 9:10 PM  

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ गिराना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

bahutbahut achchha

sundar shraddhha jii

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