Sunday, July 6, 2008

मूक हमारे हो संवाद




मेरी आँखों से तेरी आँखों तक
प्यार की जब हो गुपचुप बात
होठ सिले हों, आँखें नम हो
मौसम बजा रहा हो साज
दूर कही शहनाई बजे और
बागों में खिल उठे गुलाब
स्पर्श तुम्हारा बजे तरंग बन
दूर कहीं जलती हो आग,
एक दूजे को जाने हम जब
मूक हमारे हो संवाद

20 comments:

रंजू ranju July 6, 2008 at 1:34 PM  

एक दूजे को जाने हम जब
मूक हमारे हो संवाद

सही है यह .खमोशी की अपनी जुबान होती है जी ..सुंदर लिखा है श्रद्धा जी आपने

महेंद्र मिश्रा July 6, 2008 at 1:47 PM  

किसी भाषा की बात न हो
न हो कोई तब, जातिवाद
n bhasha ki diwaare ho
or n ho jati ka bandhan.

सुंदर सही लिखा है.

राज भाटिय़ा July 6, 2008 at 2:24 PM  

जादु कया हे मुझे नही पता, लेकिन आप की कवितो मे कुछ ऎसा ही मसुस हुया, ओर पढता चला गया.अति सुन्दर,
धन्यवाद

राजीव तनेजा July 6, 2008 at 3:32 PM  

रुमानियत से भरपूर आपकी कविता पसन्द आई

मीत July 6, 2008 at 4:52 PM  

एक दूजे को जाने हम जब
मूक हमारे हो संवाद
क्या बात है. बहुत बढ़िया. ये दो पंक्तियाँ ही काफ़ी हैं. बहुत अच्छी रचना. बधाई.

mehek July 6, 2008 at 5:57 PM  

bahut mithe masum se sundar bhav badhai

शहरोज़ July 6, 2008 at 7:54 PM  

देख गया .आपकी काविशों और कोशिशों को देख तबियत खुश हो गयी .
दुआ यही है ,जोर-कलम और ज्यादा .अल्लाह नज़र-बद से बचाए .आमीन.

Manish Kumar July 7, 2008 at 2:18 AM  

एक दूजे को जाने हम जब
मूक हमारे हो संवाद

kya baat hai bahut khoob

Anil Pusadkar July 7, 2008 at 3:22 AM  

onth sile ho aankhen nam ho,mausam bazaa raho saaj, badhiya, nahi bahut badhiya

महामंत्री-तस्लीम July 8, 2008 at 1:22 PM  

रूमानी जज्बातों को आपने बहुत ही नफासत से लफजों का जामा पहनाया है। मुबारकबाद।

zakir hussain July 8, 2008 at 2:16 PM  

प्यार में शब्द खामोश हो जाते हैं और खामोशी चारों तरफ गूंज उठती है
बहुत ही शानदार शब्दों में उस खामोशी को आवाज़ दी गयी है इस कविता मैं.
कवियित्री को ढेरों बधाई!

अनुराग July 8, 2008 at 10:31 PM  

मेरी आँखों से तेरी आँखों तक
प्यार की जब हो गुपचुप बात
होठ सिले हों, आँखें नम हो
मौसम बजा रहा हो साज

ये खामोशी बेहद हसीन है.....

Dr. Chandra Kumar Jain July 9, 2008 at 3:08 AM  

सुंदर रचना.
याद आ गयीं कुछ पंक्तियाँ

शब्द तो शोर है तमाशा है
भाव के सिन्धु में बताशा है
मर्म की बात होंठ से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है.
=======================
शुभकामनाएँ
डा.चन्द्रकुमार जैन

'ताइर' July 9, 2008 at 7:55 AM  

meri ek shayari yaad aa gayi...

kabhi kabhi zindagi aisi bhi rehti hai,
aankho se khushi ke lehar si behti hai,
koshish na karo har ehsaas jatane ki,
mehsus gar karo to, khamoshi bhi kuchh kehti hai...

pallavi trivedi July 9, 2008 at 2:29 PM  

स्पर्श तुम्हारा बजे तरंग बन
दूर कहीं जलती हो आग,
एक दूजे को जाने हम जब
मूक हमारे हो संवाद

bahut pyare ehsaas ...sundar.

Dr. RAMJI GIRI July 9, 2008 at 9:05 PM  

दूर कही शहनाई बजे और
बागों में खिल उठे गुलाब

यह तो आदर्श रूमानी माहौल पैदा करती है.
..शुक्र है इसमें कही mobile और mail नहीं है...

Pramod Kumar Kush ''tanha" July 10, 2008 at 11:29 AM  

होठ सिले हों, आँखें नम हो
मौसम बजा रहा हो साज.....

एक दूजे को जाने हम जब
मूक हमारे हो संवाद.....

Bahut khoob...kya abhivyakti hai...wah !!!
Bahut shubhkaamnaayein...

अंशुमान सिंह July 10, 2008 at 7:01 PM  

आज की कृति पढ़ी. प्रभावी है.

डॉ.ब्रजेश शर्मा July 10, 2008 at 9:46 PM  

Jab maun ke samvaad ki jhankaar
sunaai padne lagti hai to bas....

Ek kshan tumhaare hi meethe sandarbh ka ,
saara din geet geet ho chala.....

Aapka blog aanand de raha hai ,

Likhti rahiye, Shubhkaamnaayen...

shikha varshney July 1, 2009 at 5:10 PM  

wah khubsurat ahsaas or khubsurat shabd or kya chahiye kisi rachna ko....bahuut sunder shradha ji

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