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अजनबी खुद को लगे हम इस कदर तन्हा हुए हम
उम्र भर इस सोच में थे क्या कभी सोचे गए हम
खूबसूरत ज़िंदगी थी तुम से मिलकर जब बने हम
चाँद दरिया में खड़ा था आसमाँ तकते रहे हम
सुबह को आँखों में रख कर रात भर पल - पल जले हम
खो गए हम भीड़ में जब फिर बहुत ढूँढे गए हम
इस ज़मीं से आसमां तक था जुनूँ उलझे रहे हम
जीस्त के रस्ते बहुत थे हर तरफ रोके गए हम
लफ्ज़ जब उरियाँ हुए तो फिर बहुत रुसवा हुए हम
जागने का ख़्वाब ले कर देर तक सोते रहे हम
तेरे सच को पढ़ लिया था बस इसी खातिर मिटे हम
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अपने हर दर्द को अशआर में ढाला मैंने ऐसे रोते हुए लोगों को संभाला मैंने
शाम कुछ देर ही बस सुर्ख़ रही, हालांकि खून अपना तो बहुत देर उबाला मैंने
बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने
कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने
लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने
आज के दौर में सच बोल रही हूँ 'श्रद्धा' अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने
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जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी तरावत= ताज़गी
भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी
धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी
बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी
आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी
नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी
जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी
वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा' ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी
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शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी
फिर कोई कबीले से कहीं दूर चला है बग़िया में किसी फूल पे आई है जवानी
कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी
औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी
तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी
छप्पर हो, महल हो, लगे इक जैसे ही दोनों घर के जो समझ आ गए ‘श्रद्धा’ को मआनी
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तिश्नगी थोड़ी बढ़ाकर देखना सूख जाएगा समुन्दर देखना
अपनी आदत, अपने अन्दर देखना देखना खुद को निरंतर देखना
हर बुलंदी पर है तन्हाई बहुत सख्त मुश्किल है सिकंदर देखना
शाख से टूटा हुआ पत्ता हूँ मैं देखना मेरा मुक़द्दर देखना
खून जिनका धर्म और ईमान है उनके छज्जे पर कबूतर देखना
झूठ-सच का फैसला लेना हो जब चीखता है कौन अन्दर देखना
मेरा और साहिल का रिश्ता है अजब दोनों के रस्ते में पत्थर, देख ना!
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प्यार में शर्त-ए-वफ़ा पागलपन मुद्दतों हमने किया, पागलपन
हमने आवाज़ उठाई हक की जबकि लोगों ने कहा, पागलपन
जाने वालों को सदा देने से सोच क्या तुझको मिला, पागलपन
लोग सच्चाई से कतरा के गए मुझ पे ही टूट पड़ा, पागलपन
जब भी देखा कभी मुड़ कर पीछे अपना माज़ी ही लगा, पागलपन
खो गए वस्ल के लम्हे "श्रद्धा" मूंद मत आँख, ये क्या पागलपन
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हमने गुलशन उजड़ते देखा है भाई-भाई को लड़ते देखा है
इतनी वहशत जुदाई से 'तौबा' ख़्वाब तक में बिछड़ते देखा है
बोझ नजदीकियाँ न बन जाएँ कीड़ा मीठे में पड़ते देखा है
एक बस दिल की बात सुनने में हमने रिश्ते बिगड़ते देखा है
अब तो गर्दन बचाना है मुश्किल पाँव उनको पकड़ते देखा है
हार दुनिया ने मान ली "श्रद्धा" जब तुझे जिद पे अड़ते देखा है
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वो सारे ज़ख़्म पुराने, बदन में लौट आए गली से उनकी जो गुज़रे, थकन में लौट आए
हवा उड़ा के कहीं दूर ले गई जब भी सफ़र तमाम किया और वतन में लौट आए
जो शहरे इश्क था, वो कुछ नहीं था, सहरा था खुली जो आँख तो हम फिर से वन में लौट आए
बहार लूटी है मैंने कभी, कभी तुमने बहाने अश्क़ भी हम ही चमन में लौट आए
ये किसने प्यार से बोसा रखा है माथे पर कि रंग, ख़ुशबू, घटा, फूल, मन में लौट आए
गए जो ढूँढने खुशियाँ तो हार कर "श्रद्धा" उदासियों की उसी अंजुमन में लौट आए
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काश बदली से कभी धूप निकलती रहती ज़ीस्त उम्मीद के साए में ही पलती रहती
ज़ख्म कैसे भी हों भर जाते हैं रफ़्ता रफ़्ता ज़िंदगी ठोकरें खा- खा के, संभलती रहती
फ़र्ज़ दुनिया के निभाने में गुज़र जाए दिन और हर रात तेरी याद मचलती रहती
पाँव फैलाए अँधेरा है हर इक कोने में ज्योति हालाँकि हर इक बाम पे जलती रहती
शांत दिखता है समुन्दर भी लिए गहराई जब के नदिया की लहर खूब उछलती रहती
तू अगर होती खिलौना तो बहुत बेहतर था तुझसे “श्रद्धा” ये तबीयत ही बहलती रहती
बाम - छज्जा ज़ीस्त - ज़िंदगी
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रोशन थे आँखों में, वो उजाले कहाँ गए आखिर, हमारे चाहने वाले कहाँ गए
रिश्तों पे देख, पड़ गया अफवाहों का असर वाबस्तगी के सारे हवाले कहाँ गए
गम दूसरों के बाँट के, खुशयां बिखेर दें थे ऐसे कितने लोग निराले, कहाँ गए
आग़ाज़ अजनबी की तरह, हमने फिर किया काँटे मगर दिलों से निकाले कहाँ गए
मुश्किल सफ़र ने इतना किया हौसला बुलंद हैरत है मेरे पाँव के छाले कहाँ गए
बस शोर हो रहा था कि मोती तलाशिए नदिया, समुद्र, झील, खंगाले कहाँ गए
“श्रद्धा” के ख़्वाब रेत के महलों की तरह थे तूफ़ान में निशाँ भी संभाले कहाँ गए
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कल रात एक मित्र से मेरे ग़ज़ल के सफ़र की चर्चा हो रही थी , चर्चा के दौरान शुरूवाती दौर में कही गई गजलों का जिक्र आया बस मन हुआ कि एक पुरानी ग़ज़ल पोस्ट की जाए
दूरी को अपनी बढ़ाना नहीं था यूँ प्यार को आज़माना नहीं था
उसने न टोका न दामन ही थामा
रुकने का कोई बहाना नहीं था
चादर पे ख़ुशबू थी उसके बदन की
जागे तो उसका ठिकाना नहीं था
दामन पर उसके कई दाग आए आँसू उसे यूँ, गिराना नहीं था
उल्फत में कैसे वफ़ा मिलती "श्रद्धा" किस्मत में जब ये खज़ाना नहीं था
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फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए खुद-ब-खुद ग़ज़लों में अफ़साने तुम्हारे आ गए
रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुले पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए
आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये क्या तअज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए
हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रखी मगर लफ्ज़ में जाने कहां से ये शरारे आ गए
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अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया
नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया
गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया
सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा' हरिक दरीचे पे जो आफताब छोड़ गया अज़ाब – punishment / Pain सराब- Illusion आफताब- Sun
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हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते
नज़दीक बहुत गर रहे, बन जाओगे आदत ये सोच के, मिलने तुम्हें अक्सर नहीं आते
जिस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजरा उस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल हो अब ज़हन में अल्फ़ाज़ के पैकर नहीं आते
बिस्तर पे कभी करवटें बदलें वो भी 'श्रद्धा' आँखों में ये नायाब से मंजर नहीं आते.
पैकर – आकृति
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कैसे मुमकिन है, ख़मोशी से फ़ना हो जाऊँ कोई पत्थर तो नहीं हूँ, कि ख़ुदा हो जाऊँ
फ़ैसले सारे उसी के हैं, मिरे बाबत भी मैं तो औरत हूँ कि राज़ी-ओ-रज़ा हो जाऊँ
धूप में साया, सफ़र में हूँ कबा फूलों की मैं अमावस में सितारों की जिया हो जाऊँ
मैं मुहब्बत हूँ, मुहब्बत तो नहीं मिटती है एक ख़ुश्बू हूँ , जो बिखरूँ तो सबा हो जाऊँ
गर इजाज़त दे ज़माना, तो मैं जी लूँ इक ख़्वाब बेड़ियाँ तोड़ के आवारा हवा हो जाऊँ
रात भर पहलूनशीं हों वो कभी “श्रद्धा” के रात कट जाए तो, क्या जानिये क्या हो जाऊँ
फ़ना = तबाह कबा = लिबास जिया = चमक, रोशनी सबा = ठंडी हवा
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Nazm,
कितना आसान लगता था ख़्वाब में नए रंग भरना आसमाँ मुट्ठी में करना ख़ुश्बू से आँगन सजाना बरसात में छत पर नहाना
कितना आसान लगता था दौड़ कर तितली पकड़ना हर बात पर ज़िद में झगड़ना झील में नए गुल खिलाना कश्तियों में, पार जाना
कितना आसान लगता था
जिंदगी में पर हक़ीक़त ख्याल सी बिलकुल नहीं है जिंदगी समझौता है इक कोई जिद चलती नहीं है जिंदगी में पर हक़ीक़त सोच सी बिलकुल नहीं है
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हँस के जीवन काटने का, मशवरा देते रहे आँख में आँसू लिए हम, हौसला देते रहे.
धूप खिलते ही परिंदे, जाएँगे उड़, था पता बारिशों में पेड़ फिर भी, आसरा देते रहे
जो भी होता है, वो अच्छे के लिए होता यहाँ इस बहाने ही तो हम, ख़ुद को दग़ा देते रहे
साथ उसके रंग, ख़ुश्बू, सुर्ख़ मुस्कानें गईं हर खुशी को हम मगर, उसका पता देते रहे
चल न पाएगा वो तन्हा, ज़िंदगी की धूप में उस को मुझसा, कोई मिल जाए, दुआ देते रहे
मेरे चुप होते ही, किस्सा छेड़ देते थे नया इस तरह वो गुफ़्तगू को, सिलसिला देते रहे
पाँव में जंज़ीर थी, रस्मों-रिवाज़ों की मगर ख़्वाब ‘श्रद्धा’ उम्र-भर, फिर भी सदा देते रहे
2122, 2122, 2122, 212
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अब नया दीपक जलाया जाएगा फिर किसी से दिल लगाया जाएगा
चाँद गर साथी न मेरा बन सके साथ सूरज का निभाया जाएगा
रस्म-ए-रुखसत को निभाने के लिए फूल आँखों का चढ़ाया जाएगा
कर भला कितना भी दुनिया में मगर मरने पे ही बुत बनाया जाएगा
आईना सूरत बदलने जब लगे ख़ुद को फिर कैसे बचाया जाएगा
मेरी अलबम कुछ करीने से लगे उनको पहलू में बिठाया जाएगा
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सबको न गले ऐसे लगाया करो 'श्रद्धा' हमदर्द करीब अपने बिठाया करो 'श्रद्धा'
बैठो कभी जब अक्स तुम्हारा हो मुकाबिल आँखें न कभी खुद से चुराया करो 'श्रद्धा'
जाओ किसी मेले में, कभी बाग़ में टहलो हंस-हंस के भरम ग़म का मिटाया करो 'श्रद्धा'
बन्दूक तमंचे ही दिखाते हो तुम अक्सर बच्चों को परिंदे भी दिखाया करो 'श्रद्धा'
तुम दर्द की बरसात में रोजाना नहाओ सूखे में भी मल-मल के नहाया करो 'श्रद्धा'
आते ही, चले जाने की उलझन को लपेटे आते हो, तो इस तरह न आया करो 'श्रद्धा'
रिश्तों को तिजारत की तराजू से न तोलो कुछ त्याग-समर्पण भी उठाया करो 'श्रद्धा'
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मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना पल में रोता, पल में हंसता है आईना
शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में दरवाज़े को शब भर तकता है आईना दिलवर हैं आ बैठे पल भर को पास मेरे इक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना गैरों के घर रोशन करने की है आदत चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना
राजा और प्यादा में अंतर करता है जग हर इक को इक कद में रखता है आईना
आगाज़ ग़ज़ल का कर ही दो अब “श्रद्धा” तुम उलझा-उलझा मुझको दिखता है आईना
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